सीता हरण की कथा और कहानी – Sita Haran by Ravan

रामायण काल की सबसे बड़ी घटना प्रभु श्री राम एवं राक्षस रावण का युद्ध है, आइये आज इसके पीछे की वजह – सीता हरण की कथा अथवा सीता हरण की कहानी को हम विख्यात में पढ़ते हैं.

आपने अक्सर सुना होगा कि हर चीज के होने के पीछे कुछ न कुछ कारण जरूर रहता है, ठीक उसी तरह से भगवान राम और रावण के बीच हुए युद्ध के पीछे सीता हरण एक वजह थी| आइये जानते हैं कि सीता हरण क्यों और कैसे हुआ ?

रामायण ⇓

» सम्पूर्ण रामायण कथा और कहानी

» भगवान श्री राम की कहानी

सीता हरण की कथा – सीता हरण की कहानी

सरयू नदी के किनारे स्थित राज्य अयोध्या में राजा दशरथ जी राजा के पद पर उस समय विराजमान थे, उनकी तीन रानियां (कोशलीया, कैकई और सुमित्रा) से उनको चार पुत्र (राम, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघन) हुए थे.

बहुत ही प्यार और स्नेह से उन चारो राजकुमारों का पालन पोषण हुआ, 16 वर्ष की आयु में युवराज राम और लक्ष्मण महारिशी विश्वामित्र के साथ उनके आश्रमण में गए थे जहाँ उनको यज्ञ करते वक्त कुछ राक्षस बहुत परेशान किया करते थे.

राम और लक्ष्मण ने उनका वध कर दिया और फिर कुछ ही समय बाद वो रामायण में सीता स्वयंवर में जनकपुर राज्य जा पहुचे| वहाँ राम जी का विवाह माता सीता संग उनके तीनों भाइयों का सीता जी के तीनों बहनो के साथ हो गया.

विवाह के बाद बारात अयोध्या आ गई और सब वही रहने लग गए, कुछ समय बाद ही राजा दशरथ जी ने अपने बड़े बेटे राम जी को अयोध्या का राज काज देने का निर्णय लिया लेकिन माता कैकई की दासी मंथरा ने उनके कान भर दिये जिस वजह राजा दशरथ ने अपने जान से प्यारे पुत्र को 14 वर्ष का वनवाश की सजा सुना दी.

पुत्र ने भी अपने पिता की आज्ञा का मान रखते हुए वन जाने को मान गए|

उनकी धर्म पत्नी और भाई ने भी उनके साथ वन जाने का फैसला किया और तीनों अयोध्या से वन के लिए निकल गए|

इधर बेटे के वन जाने के गम मे कुछ ही दिन बाद उनके पिता दशरथ जी भी भगवान के प्रिय हो गए|

वनवास के 13 वर्ष का समय तो उनका ऋषि एवं मुनियो की मदद, और राक्षसों का वध करते-करते निकल गए, आखिरी वर्ष में वो पंचवटी नामक एक स्थान पर जा पहुचे, और सीता माता के कहने पर वो अपना बचा हुआ वनवास का समय वही एक कुटिया बना के उसमे रहने लग गए.

जरुर पढ़े ⇒ Shrimad Bhagwat Geeta

रामायण का इतिहास : जानिए कैसे लक्ष्मण ने किया सूर्पनखा का वध

एक दिन सूर्पनखा नामक एक राक्षसी पंचवटी में जा पहुची और तभी उसकी नजर भगवान श्री राम पर पड़ी, भगवान की सुंदरता को देख वो मोहित हो गई|

तुरंत उसने अपना रूप बदला और एक सुंदर युवती बन के प्रभु राम के पास अपने विवाह का प्रस्ताव लेकर चली गई|

श्री राम ने उस राक्षसी को बताते हुए कहा कि वो विवाहित हैं और सीता जी को दिखाते हुए उन्होंने बताया कि वो उनकी पत्नी है और पत्नी के रहते वो दूसरे विवाह के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं.

तभी उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण से टेह लेने के लिए सूर्पनखा को बताया कि तुम मेरे भाई से विवाह कर सकती हो वो मेरे ही भांति सुंदर एवं घटीले शरीर का युवक है, भगवान राम की बात मानते हुए वो फिर अपने विवाह का प्रस्ताव लक्ष्मण जी के पास ले गई.

लक्ष्मण जी वैसे तो जल्दी गुस्सा हो जाने वाले स्वभाव के इंसान थे परंतु उन्होंने पहले सूर्पनखा को बोला की मै अपने भैया और भाभी का सेवक हूँ, यदि तुमने मुझसे शादी की तो तुम्हें भी उनका सेवक बन कर ही रहना पड़ेगा, क्या तुम रह पाओगी?

सूर्पनखा को समझ आ गया था कि दोनों ही भाई (राम एवं लक्ष्मण) उसके साथ मजाक कर रहे हैं, दोनों में से कोई भी उससे शादी करने के लिए तैयार नहीं है और ना होगा और तब सूर्पनखा के दिमाग में एक सुझाव आया|

सूर्पनखा ने सीता जी पर आक्रमण कर उनको मारने की सोच रखी ताकि उनकी मौत के बाद प्रभु राम उनसे शादी कर लें, यह देख लक्ष्मण जी को गुस्सा आ गया और उन्होंने सूर्पनखा की नाक काट दी|

Ramayan Sita Haran Story in Hindi – सीता हरण की कथा

नाक कटते ही वो अपने असली (राक्षसी) रूप में आ गई और वहाँ से अपने भाइयों (खर और दूषण) के पास चिल्लाते-चिल्लाते और रोते-रोते जा पहुची|

वहाँ उसने अपनी गलती को ना बताते हुए अपने भाइयो को राम और लक्ष्मण के प्रति भढ़काया और उनसे अपने अपमान का बदला लेने को कहा|

बहन द्वारा बताई गई बाते सुन कर दोनों भाई (खर और दूषण) आग बबूला हो गए और वो राम जी और लक्ष्मण जी से अपनी बहन के अपमान का बदला लेने पंचबटी जा पहुचे| उनके जैसे ना जाने कितने राक्षसो को मार कर राम और लक्ष्मण जी ने वनवास के पिछले 13 वर्ष बिताये थे.

खर और दूषण भी राम और लक्ष्मण द्वारा कुछ ही छन्न में मारे गए|

सूर्पनखा के भाइयों की मृत्यु के बाद अब वो और ज्यादा अपमानित महसूस करने लगी थी, अब वो राक्षसो के राजा, लंकापति रावण के पास रोती और बिलखती हुई जा पहुंची| उसने रावण को अपने भाइयों की मृत्यु और सीता जी की सुंदरता के बारे में बताते हुए रावण को राम और लक्ष्मण से युद्ध करने के लिए उकसाया.

रावण तुरंत ही पंचवटी जा पहुंचा और वहाँ सीता माता के रूप और लावण्या को देख रावण के मन में कुटिल विचार आ गए, साथ ही राम और लक्ष्मण की शक्तियों को आँकने के बाद उसको यह महसूस हो गया कि उनके रहते वो सीता माता का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है.

रावण अब यह सोचने लगा कि सीता का हरण कैसे करना है और सूर्पनखा को लगा कि उसका भाई उसके अपमान का बदला लेने के लिए रणनीति तैयार कर रहा है, जबकि सच्चाई तो कुछ और ही थी|

Story of Sita Haran in Hindi | सीता हरण की कथा | सीता हरण की कथा

Sita Haran by Ravan : रावण अपने बनाए गए रणनीति में सफल होने के लिए राक्षस मारीच के पास जा पहुचा, रावण जानता था कि मारीच ने तप द्वारा कुछ ऐसी शक्तियाँ प्राप्त कर ली है, जिससे वो मन चाहा रूप आसानी से धारण कर सकता है.

अपनी शक्ति के आधार पर मारीच पहले तो बहुत गलत काम करता था, परंतु वह अब वृद्ध हो चुका था और अब वह अपनी बची हुई जिन्दगी में बुरे कामो को छोर ईश्वर भक्ति में लग गया था.

रावण की चाल सुनने के बाद उसका मन तो उसके साथ शामिल होने का नहीं था, परंतु वह उस काम को करने के लिए मान गया| क्यूंकी वो जानता था कि यदि उसने रावण का काम किया तो प्रभु राम द्वारा मारा जाएगा और यदि उसने काम करने से इंकार कर दिया तो राक्षस रावण उसकी हत्या कर देगा.

उसने सोचा कि रावण के हाथों मरने से बेहतर है कि भगवान राम के हाथों ही मृत्यु मिले, खुश मन से मारीच रावण के पुष्पक विमान पर बैठ पंचबटी की और चल पड़ा|

रास्ते में जाते वक्त रावण ने मारीच को बोला कि तुम स्वर्ण मृग (सोने के हिरण) का रूप धारण कर पंचवटी में राम के कुटिया के आस पास तब तक घूमना जब तक सीता की नजरे ना उनपर पड़ जाये|

पंचवटी पहुच कर मारीच ने वैसा ही किया जैसा उसको करने के लिए कहा गया था|

रावण ने सीता का हरण कैसे किया था ? सीता हरण की कथा और कहानी

जब सीता जी की नजरे उस स्वर्ण मृग पर पड़ी तो उनको वो बहुत पसन्द आया और उन्होंने उसको हासिल करने की इच्छा अपने पति के समक्ष की|

राम जी ने अपनी पत्नी की इच्छा का मान करते हुए अपने भाई लक्ष्मण को भाभी (सीता) का ध्यान रखने का आदेश देकर अपने धनुष लिए उस मृग के पीछे जंगल की ओर चल पड़े|

काफी समय बीत जाने के बाद सीता माता चिंतित होने लगी और उन्होंने अपने देवर को उनके भैया को देखने के लिए जंगल जाने के लिए बोला|

बड़े भाई द्वारा दिये गए आदेश का पालन करते हुए लक्ष्मण जी बोले – भैया का कोई बाल भी बाका नहीं कर सकता है, और आप बिलकुल भी चिंतित मत होइए भैया जल्द ही उस स्वर्ण मृग को लेकर वापिस आ जाएँगे.

इधर मारीच ने स्वर्ण मृग के रूप में प्रभु राम को बहुत देर तक घुमाया, अंत में जब प्रभु राम जी को लगा की वो उस मृग को पकड़ सकते हैं तब उन्होंने उसपर वबाण चला दिया, मृग की मृत्यु उससे अब ज्यादा दूर नहीं थी और इस वजह से वो मरते मरते प्रभु राम की आवाज मे तेज स्वर में चिल्लाया – हे सीते, हे लक्ष्मण!

बस अब क्या था, सीता जी ने जैसे ही अपने स्वामी की वह स्वर सुनी उनका मन और भयभीत हो गया और अब वो लक्ष्मण जी को गुस्से में बोली – मेरे स्वामी सच में किसी समस्या में है क्या तुम अब जाओगे या फिर मै जाऊ उनको देखने?

लक्ष्मण जी का विश्वास था परंतु भाभी के कहने पर वो अपने बड़े भाई को देखने के लिए जंगल की ओर जाने के लिए राजी हो गए, परंतु जाने से पहले उन्होंने कुटिया के चारो ओर एक रेखा खिची जिसको की लक्ष्मण रेखा कहा जाता है.

जंगल की और जाते समय लक्ष्मण अपनी भाभी से बोले – चाहे कितनी भी बड़ी आपदा क्यों ना आ जाए कृपया कर आप इस रेखा के अंदर ही रहे जब तक वो या राम जी वन से वापिस ना आ जाये.

इतनी देर से रावण इस वक्त के इंतजार में बैठा था, कि कब सीता जी अकेले हो|

मौका मिलते ही उसने तुरंत एक भिक्छुक का भेष अपनाया और भिक्षा मागने के बहाने कुटिया के बाहर जा खड़ा हुआ|

आवाज सुन सीता जी भिक्षा देने के लिए बाहर आई और भिक्षा देने के लिए उन्होंने लक्ष्मण द्वारा बनाया हुआ लक्ष्मण रेखा को पार कर लिया|

रावण ये देख बहुत ही खुश हुआ और वो अपने असली रूप में आ कर सीता जी को खिचते हुए अपने पुष्पक विमान की और ले जाने लगा|

पहले तो सीता जी को कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर उनके साथ हो क्या रहा है, परंतु जब उनको समझ में आया तो उन्होंने अपने आभूषण जमीन पर गिराने आरंभ कर दिये ताकि प्रभु राम जी जब उनकी तलाश में आए तो उनको सीता जी के आभूषण देख कर उन तक पहुचने का मार्ग ज्ञात हो सके.

रावण के संग जाते वक्त माता सीता सहायता के लिए चिल्ला रही थी, यह सुन कर एक विशाल पक्षी जिसका नाम जटायु था वो रावण से लड़ने के लिए आया परंतु रावण ने उसके पर काट दिये जिस वजह से वो धरती पर गीर गया और कराहने लगा.

दूसरी और वन में राम और लक्ष्मण मिल चुके थे और तब बात करने पर उनको मालूम हुआ कि यह ज़रूर किसी की कोई चाल है और अब कोई अनहोनी ना हो गई हो|

तभी दोनों भाई भागते हुए कुटिया पहुचे और सीता माता को ना पाकर उनको सब कुछ समझ में आ गया|

दोनों भाई सीता माता की खोज में निकल गए, रास्ते में उनको सीता माता के द्वारा गिराए गए आभूषण मिले जिसे देख उनको ज्ञात हुआ कि उनका अपहरण किया गया है, थोड़ी दूर और आगे जाने के बाद उनकी मुलाकात जटायु से हुई और उसने राम और लक्ष्मण को सत्य बताया.

जटायु ने बताया कि लंका का राजा रावण, राम की पत्नी सीता जी को अपने राज्य लंका अपने पुष्पक विमान से ले गया है और उसने यह भी बताया कि जब वो मदद के लिए आगे बढ़ा तो उसके पंख रावण ने काट दिये|

दोस्तो यह थी सीता हरण की कथा और सीता हरण की कहानी, आशा है आपको यह लेख अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा|

आप चाहे तो इस जानकारी को अपने अन्य मित्रों के साथ सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर भी कर सकते हैं|

यदि इस लेख से जुड़ी किसी भी तरह की आपको कोई समस्या है तो आप कमेंट के माध्यम से अपना डाउट क्लियर कर सकते हैं.

सम्पूर्ण महाभारत ⇓

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
Himanshu Grewal

मेरा नाम हिमांशु ग्रेवाल है और यह एक हिंदी ब्लॉग है जिसमे आपको दुनिया भर की बहुत सारी जानकारी मिलेगी जैसे की Motivational स्टोरी, SEO, इंग्लिश स्पीकिंग, सोशल मीडिया etc. अगर आपको मेरे/साईट के बारे में और भी बहुत कुछ जानना है तो आप मेरे About us page पर आ सकते हो.

Leave a Comment