गुरु द्रोणाचार्य की कहानी, इतिहास व सम्पूर्ण जीवन परिचय

एक बार फिर से मैं हिमांशु आप सभी का आज के इस लेख में स्वागत करता हूँ, जिसमे हम गुरु द्रोणाचार्य की कहानी और इनका जीवन परिचय विख्यात में पढ़ेंगे.

इस लेख को शुरू करने से पहले मैं आपको याद दिला दूँ (यदि आप भूल गए हैं तो,) कि गुरु द्रोणाचार्य का उल्लेख महाभारत में कई बार हुआ है.

अब जब किसी व्यक्ति के नाम के आगे गुरु शब्द लग गया है तो इसका अर्थ तो आप यह लगा सकते हैं कि वो गुरु यानि की वो अपने समय के शिक्षक रहे होंगे.

अब आपमे से कुछ के दिमाग में यह भी आया होगा कि क्या आज कल जो हिट पंजाबी सिंगर गुरु रंधावा है क्या वो भी गुरु यानि किसी का शिक्षक है?

तो मैं आपको जवाब दे देता हूँ कि ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस प्रकार कई और दूसरे सिंगर और एक्टर का रियल नाम कुछ और है और जिस नाम से हम उनको जानते हैं वो कुछ और है ठीक उसी तरह से गुरु रंधावा का रियल नाम भी गुरु शरणजीत सिंह रंधावा है.

अब हम टॉपिक की और आते हैं और जानते हैं की किस प्रकार द्रोण एक आचार्य एवं गुरु बने, तो चलिये दोस्तो शुरू करते हैं.

Biography of Guru Dronacharya in Hindi

गुरु द्रोणाचार्य की कहानी : यह करीबन 5000 से भी ज्यादा वर्ष पुरानी बात है, द्रोणाचार्य के पिता जी जिनका नाम भारद्वाज था, जो कि एक महर्षि थे और वो महर्षि भारद्वाज से जाने जाते थे.

जैसा की आप जानते हैं कि पहले के समय के व्यक्ति (नर और नारी दोनों ही) नदी के किनारे जा कर ही स्नान किया करते थे, ठीक उसी प्रकार एक बार महर्षि भारद्वाज भी नदी में स्नान करने गए|

जब उन्होने स्नान पूर्ण कर लिया तो वो अपने आश्रम की और लौट ही रहे थे तभी उनकी नजर एक अप्सरा (जो कि बहुत ही खूबसूरत दिखाई देती थी) पर पड़ी जिसका नाम घृताची था|

घृताची नग्न होकर स्नान कर रही थी, और उसको स्नान करते देख महर्षि भारद्वाज कामातुर हो पडे और फिर तभी उनके शिश्न से वीर्य टपक पड़ा|

गुरु द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ था – गुरु द्रोणाचार्य की कहानी

उन्होने अपने शिश्न से टपकता हुआ वीर्य को एक द्रोण कलश में रखा, वही दूसरे मत से कामातुर भरद्वाज ने घृताची उसी अप्सरा के साथ शारीरिक मिलन किया, जिनकी योनिमुख द्रोण कलश के मुख के समान थी.

उस वीर्य और अप्सरा के शारीरिक मिलन से इस पृथ्वी पर द्रोण ने जन्म लिया, क्यूंकी वे द्रोण से उत्पन्न हुए थे इसी वजह से उनका नाम द्रोणाचार्य पड़ा था|

अब जब महर्षि भारद्वाज जो कि द्रोणाचार्य ने पिता होने के साथ एक महर्षि भी थे तो ज़ाहिर सी बात है कि वे एक आश्रम में ही रहते थे क्यूंकी उस समय सिर्फ राजपूत ही राजा हुआ करते थे और उन्ही के पास बहुत ज्यादा जमीन हुआ करती थी.

वही ब्रह्मम जाती के लोग आश्रम में रहते थे एवं साधु सन्यासी के रूप में एक जगह से दूसरी जगह भ्रमण किया करते थे, और भिक्षा प्राप्ति किया करते थे.

तो वही पिता (द्रोणाचार्य अपने पिता महर्षि भारद्वाज जी) के साथ उसी आश्रम में रहते हुए उन्होने चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था.

द्रोण के साथ-साथ एक राजा जिनका नाम पृषत् था उनके पुत्र द्रुपद भी वही उसी आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, और उसी दौरान द्रोण और द्रुपद की घनिष्ठ दोस्ती हो गई थी.

उन्हीं दिनों भगवान परशुराम जी ने अपनी पूरी संपत्ति को ब्राह्मणों में दान में दे दिया था और खूद महेन्द्राचल पर्वत (जो कि प्राचीन भारत के सप्तकुल पर्वतों में से एक है) पर तप करने चले गए थे.

कुछ ही दिनो बाद द्रोण भी उनके पास पहुँचे और उनसे दान यानि भिक्षा देने का अनुरोध किया, क्यूंकी जैसा कि मैंने आपको बताया की यह महर्षि के पुत्र थे तो आगे चल कर इन्हें भी साधु संत का ही रूप धारण करना था.

तो जब द्रोण ने भिक्षा के लिए अनुरोध किया तो उस पर परशुराम बोले, “वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, अर्थात तुम्हें यह ज्ञात होगा कि मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है| अब मेरे पास आपको देने के लिए केवल अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं, तो यदि तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।”

द्रोण पहले से ही सब कुछ जानते थे एवं वो यही तो चाहते थे, अतः उन्होंने कहा, “हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी| (बात यहाँ पर समाप्त नहीं हुई, आगे पढ़िये देखिए गुरु द्रोण ने भिक्षा में और किस चीज़ की मांग की|)

लेकिन आपको मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा-दीक्षा देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा, कि आखिर किस प्रकार से इसका इस्तेमाल किया जाएगा एवं मेरे लिए किस प्रकार से यह लाभदायक होंगे|”

अब जब किसी साधु ने कोई भिक्षा मांगी है तो उन दिनों लोगो का यह कर्तव्य बनता था की वो उन्हे खाली हाथ ना जाने दें, तो इस प्रकार से परशुराम जी ने द्रोण को विद्या देने के लिए हाँ कर दी और फिर इसी प्रकार से गुरु द्रोण उनके शिष्य बन गए और अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञान लेने लगे.

Mahabharat Guru Dronacharya History in Hindi

अब जब गुरु द्रोण ने सभी तरह कि शिक्षा की प्राप्ति कर ली थी तो अब बारी थी उनके विवाह की| द्रोण का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी (कृपाचार्य) के साथ हो गया था|

कृपी से उनके एक पुत्र ने जन्म लिया था, जो की आगे चल कर महाभारत के एक महत्त्वपूर्ण पात्र बने थे, अब शायद आप में से कुछ लोग तो यह सोचने लगे होंगे की उनका नाम क्या था ?

तो चलिये मैं आपको उनका नाम बताता हूँ – द्रोण और कृपी के पुत्र का नाम अश्वत्थामा था|

अक्सर माता-पिता की चाहत होती है कि वो अपने बच्चे को ज्यादा से ज्यादा शिक्षा की प्राप्ति कराएँ और खास कर वो ज्ञान तो जरूर दें जो उनको खूद को है.

तो इसी भांति द्रोणाचार्य को ब्रह्मास्त्र का प्रयोग बहुत ही अच्छे से ज्ञात था और उसको प्रयोग करने की विधि उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा को भी सिखाई थी.

गुरु द्रोणाचार्य का जीवन परिचय – गुरु द्रोणाचार्य की कहानी और इतिहास

द्रोणाचार्य के विवाह के उपरांत प्रारंभिक जीवन थोड़ा गरीबी में बीत रहा था, जिस प्रकार गरीबी से हर एक व्यक्ति परेशान हो कर टूट जाता है ठीक उसी तरह से द्रोण भी टूट गए थे.

गरीबी से तंग आकर उन्होंने अपने सहपाठी द्रुपद जिसने उनके साथ चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान की प्राप्ति की थी उससे सहायता मांगने की सोची थी.

सहायता लेने के लिए जब गुरु द्रोण उनके पास पहुचे तो उन्होंने मदद करने से साफ इंकार कर दिया और इतना ही नहीं द्रुपद ने उन्हें अपमानित कर अपने भवन से बाहर भी निकाल दिया था.

कई बार हमारी जिन्दगी में हम कई ऐसे परिस्थितियों का सामना करते हैं कि जिनसे हमे जिंदगी भर के लिए एक सीख मिल जाती है उसके साथ ही हम सोच लेते हैं की इस बात का जवाब इन्हें हम समय आने पर देंगे| (अपना टाइम आएगा 😜)

ठीक उसी तरह से दोस्त के और से ठुकरा दिए जाने के बाद द्रोण ने अपने साथ हुए उस अपमान के लिए बदला लेने की भीषण प्रतिज्ञा ले ली थी, और वहाँ से निकल गए थे.

दोस्तों जरा सोचिए एक तरह यह भी दो दोस्तो की कहानी है और दूसरी और भगवान श्री कृष्ण एवं सुदामा की दोस्ती की कहानी भी आपने कई बार सुनी होगी.

मेरा यहाँ आपको श्री कृष्ण एवं सुदामा की बात याद दिलाने का बस यही कारण था की सोचिए किस-किस प्रकार के प्राणी इस पृथ्वी पर उपस्थित थे एवं आज भी है और हमेशा रहेगा क्यूंकी वैसे लोगो का होना भी इस पृथ्वी पर जरूरी है तभी तो समाज का निर्माण होता है.

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तो चलिए दुबारा से अपने टॉपिक की और आते हैं और जानते हैं की प्रतिज्ञा लेने के बाद जब द्रोण वहाँ अपने दोस्त द्रुपद के महल से बाहर आए तो उनके साथ क्या हुआ था.

कुछ समय पश्चात एक बार गुरु द्रोण वन में भ्रमण कर रहे थे और कही जा रहे थे तभी उनकी नजर कुछ बच्चों पर पड़ी जो कि एक कुएँ के चारों और खड़ें होकर कुएँ में ध्यान से देख रहे थे.

जब वे उन बच्चों के समीप गए तो उन्होंने पाया की उन बच्चो की गेंद खेलते-खेलते गलती से कुएँ में गिर गई है और अब वे उसको निकालने के प्रयास में जुटे हुएँ हैं.

वह देख द्रोणाचार्य ने अपनी धनुर्विद्या का इस्तेमाल और उसकी कुशलता से उस गेंद को कुएं से बाहर निकाल दिया, गेंद पाने के उपरांत बच्चे बहुत खुश हो गए|

दोस्तों अब मैं आपको बता दूँ की वो बच्चे कोई आम बच्चे नहीं थे वे महाभारत के चर्चित पात्र पांडव एवं कौरव थे, जो अपने भीष्म पितामह के साथ वन भ्रमण पर उस समय वहाँ उपस्थित थे.

द्रोण के उस अद्भुत प्रयोग के विषय में तथा उनके समस्त विषयों मे प्रकाण्ड पण्डित होने के विषय में ज्ञात होने पर भीष्म पितामह ने उन्हें राजकुमारों के उच्च शिक्षा के नियुक्त कर राजाश्रय (हस्तिनापुर) में ले लिया और फिर उनके नाम के साथ आचार्य शब्द भी जुड़ गया और उनका नाम द्रोणाचार्य पड़ गया.

कुरू प्रदेश में पांडु के पांचो पुत्र तथा धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के वे गुरु थे, जहां उन्होंने गुरु होने के अपने सारे कर्तव्य को निभाया एवं अपने शिष्यों को अस्त्र-शस्त्रों में निपुण बनाया.

पांडवों और कौरवों के अलावा गुरु द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों में एकलव्य का नाम उल्लेखनीय है क्यूंकी कौरवो और पांडवो ने द्रोणाचार्य के आश्रम में ही अस्त्रो और शस्त्रो की शिक्षा पायी थी.

लेकिन एकलव्य को तो शिक्षा देने से द्रोणाचार्य ने साफ इंकार कर दिया था परंतु फिर भी एकलव्य ने उनके बिना यानि गुरु के बिना ही अपने शिक्षा की प्राप्ति की थी और गुरु दक्षिणा में एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा दे दिया.

दोस्तों यदि आप विख्यात में जानना चाहते हैं कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसका अंगूठा गुरु दक्षिणा में क्यों मांगा था तो आप महाभारत में वीर एकलव्य की कहानी का लेख पढ़ सकते हैं, इसके पीछे भी काफी रोमांचक कहानी है.

महाभारत में द्रोणाचार्य का वध किस प्रकार हुआ था – Dronacharya Death in Mahabharat in Hindi

महाभारत के युद्ध के समय गुरु द्रोणाचार्य कौरव पक्ष के सेनापति थे, वीर धरोहर होने के बाद भी उन्होने युधिष्ठिर के आधे झूठ बोलने के कारण अपने सभी शस्त्र त्याग दिए थे| और युद्धभूमी पर ही ध्यानमग्न हो गये|

तभी धृष्टद्युम्न जो कि द्रुपद के पुत्र थे| द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने निहत्थे द्रोण का सर काट दिया जिस कारण गुरु द्रोणाचार्य जी की मृत्यु हो गई थी.

तो दोस्तों यह था गुरु द्रोणाचार्य की कहानी और गुरु द्रोणाचार्य का इतिहास, आशा है आपको इस लेख को पढ़ने में मज्जा आया होगा और अब आप इसे अपने दोस्तो के साथ सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर भी करेंगे.

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