छत्रपति संभाजी महाराज का इतिहास और सम्पूर्ण जीवन परिचय

भारत के इतिहास में कई वीर हस्तियों ने अपना नाम अमर किया है, आज उन्ही में से एक मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति संभाजी महाराज मराठा के बारे में आपको इस लेख में जानने को मिलेगा.

लेख को शुरू करने से पहले आईये मराठा साम्राज्य के बारे में जानकारी प्राप्त करते है:-

यह एक भारतीय साम्राज्यवादी शक्ति थी जो 1674 से 1818 तक अस्तित्व में रही|

मराठा साम्राज्य की स्थापना किसने की थी ?

मराठा साम्राज्य की नींव छत्रपती शिवाजी ने 1674 में डाली और तभी से इस साम्राज्य की शुरुआत हुई|

उन्होने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। बाद में आये पेशवाओं नें इसे उत्तर भारत तक बढाया, ये साम्राज्य 1818 तक चला और लगभग पूरे भारत में फैल गया.

इसी साम्राज्य के दूसरे छत्रपति का नाम सम्भाजी था जो कि शिवाजी के पुत्र थे| आइये अब जानते हैं छत्रपति संभाजी मराठा का जीवन परिचय कुछ आसान शब्दो में ताकि आपको नींद ना आए और आप फ्रेश तरीके से पढ़ कर इसको अपने मस्तिष्क में स्टोर करके रख सके|

क्यूंकी अक्सर इतिहास की किताब पढ़ कर सबको नींद आती है, लेकिन मै दावे के साथ बोल सकता हूँ की इस लेख को पढ़ कर आपको बिलकुल भी नींद नहीं आएगी| तो चलिये शुरू करते हैं.

छत्रपति संभाजी राजे भोसले – Chatrapati Sambhaji Maharaj Biography in Hindi

छत्रपति संभाजी राजे या संभाजी (1657-1689) मराठा सम्राट और छत्रपति शिवाजी महाराज के उत्तराधिकारी थे| उस समय मराठाओं के सबसे प्रबल शत्रु मुगल बादशाह औरंगजेब बीजापुर और गोलकुंडा का शासन हिन्दुस्तान से समाप्त करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही.

संभाजी राजे अपनी शौर्यता के लिये काफी प्रसिद्ध थे, उन्होने अपने कम समय के शासन काल में 168 युद्ध किये और इसमें एक प्रमुख बात ये थी कि उनकी सेना एक भी युद्ध में पराभूत यानिकी हारी नहीं थी.

उनके पराक्रम की वजह से परेशान होकर दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने कसम खायी थी की जब तक छत्रपती संभाजी पकडे नहीं जायेंगे, वो अपना किमोंश सर पर नहीं चढ़ाएगा.

दोस्तों, यह एक शॉर्ट डिस्कशन था, सोचिए जब आप इसको विख्यात मे पढ़ेंगे तो आपको और कितनी जानकारी प्राप्त होगी ? तो चलिये अब विस्तार में पढ़ना शुरू करते हैं.

छत्रपति संभाजी महाराज की कहानी – Chatrapati Sambhaji Maharaj History in Hindi

पिता का नाम :छत्रपति शिवाजी महाराज
माता का नाम :सईबाई
जन्म तिथि :14 मई 1657 को पुरंदर दुर्ग, पुणे, भारत मे हुआ
मृत्यु :मार्च 11, 1689 में मात्र 31 वर्ष की आयु में तुलापुर, पुणे, भारत में हुआ
धर्म :धर्म कि अगर हम बात करे तो यह हिन्दू धर्म के थे

छत्रपति संभाजी नौ वर्ष की अवस्था में पुण्यश्लोक छत्रपती श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रसिद्ध आगरा यात्रा में वे साथ गये थे| औरंगजेब के बंदीगृह से निकल, पुण्यश्लोक छत्रपती श्री छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र वापस लौटने पर, मुगलों से समझौते के फलस्वरूप, संभाजी मुगल सम्राट द्वारा राजा के लौटने पर, मुगलों से समझौते के फलस्वरूप, संभाजी मुगल सम्राट द्वारा राजा के पद तथा पंचहजारी मंसब से विभूषित हुए.

औरंगाबाद की मुगल छावनी में, मराठा सेना के साथ, उसकी नियुक्ति हुई| (1668) युगप्रवर्तक राजा के पुत्र रहते उनको यह नौकरी मान्य नहीं थी| किन्तु हिन्दवी स्वराज्य स्थापना की शुरू के दिन होने के कारण और पिता पुण्यश्लोक छत्रपती श्री शिवाजी महाराज के आदेश के पालन हेतु केवल 9 साल के उम्र में ही इतना जिम्मेदारी का लेकिन अपमान जनक कार्य उन्होंने धीरज से किया.

उन्होंने अपने उम्र के केवल 14 साल में उन्होंने बुद्धभुषण, नखशिख, नायिकाभेद तथा सातशातक यह तीन संस्कृत ग्रंथ लिखे थे| पुण्यश्लोक छत्रपति श्री शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक और हिन्दु स्वराज्य के बाद स्थापित अष्टप्रधान मंत्रिमंडल में से कुछ लोगों की राजकारण की वजह से यह संवेदनशील युवराज काफी क्षतिग्रस्त हुए थे.

पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें अनेक लड़ाईयों से दूर रखा गया| स्वभावत: संवेदनशील रहने वाले संभाजी राजे उनके पिता शिवाजी महाराज जी की आज्ञा अनुसार मूघालो को जा मिले ताकी वे उन्हे गुमराह कर सके। क्यूँकि उसी समय मराठा सेना दक्षिण दिशा के दिग्विजय से लौटी थी और उन्हे फिर से जोश में आने के लिये समय चाहिये था.

इसलीये मूघालो को गुमराह करने के लिये पुण्यश्लोक छत्रपती श्री शिवाजी महाराज जी ने ही उन्हे भेजा था वह एक राजतंत्र था| बाद में छत्रपती शिवाजी महाराज जी ने ही उन्हे मूघालो से मुक्त किया|

मगर इस प्रयास में वो पत्नी रानी दुर्गाबाई और बहन गोदावरी उनको अपने साथ लाने में असफल रहे|

पुण्यश्लोक छत्रपति शिवाजी श्री महाराज की मृत्यु (3 अप्रैल 1680) के बाद कुछ लोगों ने धर्मवीर छात्रपती श्री संभाजी महाराज के अनुज राजाराम को सिंहासनासीन करने का प्रयत्न किया। किन्तु सेनापति मोहिते के रहते यह कारस्थान नाकामयाब हुआ और 10 जनवरी 1681 को संभाजी महाराज का विधिवत राज्याभिषेक हुआ.

इसी वर्ष औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर ने दक्षिण भाग पर धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज का आश्रय ग्रहण किया| अकेले मुग़ल, पोर्तुगीज, अंग्रेज़ तथा अन्य शत्रुओं के साथ लड़ने के साथ ही उन्हें अंतर्गत शत्रुओं से भी लड़ना पड़ा.

राजाराम को छत्रपति बनाने में असफल रहने वाले राजाराम समर्थकों ने औरंगजेब के पुत्र अकबर से राज्य पर आक्रमण करके उसे मुग़ल साम्राज्य का अंकित बनाने की गुजारिश करने वाला पत्र लिखा। किन्तु धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज के पराक्रम से परिचित और उनका आश्रित होने के कारण अकबर ने वह पत्र छत्रपति संभाजी को भेज दिया.

इस राजद्रोह से क्रोधित छत्रपति श्रीसंभाजी महाराज ने अपने सामंत को मृत्युदंड दिया। तथापि उन में से एक बालाजी आवजी नामक सामंत की समाधी भी उन्होंने बनायीं जिनके माफ़ी का पत्र छत्रपति संभाजी को उन सामंत के मृत्यु पश्चात मिला.

1683 में उन्होने पुर्तगालियों को पराजित किया। इसी समय वह किसी राजकीय कारण से संगमेश्वर में रहे थे|

आइये अब जानते हैं कि कितनी बेरहमी से औरंजेब ने वीर मराठा संभाजी को योजना बनाके उनके रास्ते से ही उन तक पहुच के उनको मार डाला|

छत्रपति संभाजी महाराज की मृत्यु कैसे हुई – Chatrapati Sambhaji Maharaj Death Story in Hindi

जिस दिन वो रायगड के लिए प्रस्थान करने वाले थे उसी दिन कुछ ग्रामस्थ ने अपनी समस्या उन्हें अर्जित करनी चाही| जिसके चलते छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख के बाकि सेना को रायगड भेज दिया| उसी वक्त उनके एक फितूर जिनको उन्होंने वतनदारी देने से इन्कार किया था.

मुग़ल सरदार मुकरब खान के साथ गुप्त रास्ते से 5000 की फ़ौज के साथ वहां पहुंचे। यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठों को पता था| इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था की शत्रु इस और से आ सकेगा|

उन्होंने लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का प्रतिकार काम कर न पाया और अपने मित्र तथा एकमात्र सलाहकार कवि कलश के साथ वह बंदी बना लिए गए (1 फरबरी, 1689)।

औरंगजेब ने दोनों की जुबान कटवा दी, आँखें निकाल दी| 11 मार्च 1689 हिन्दू नव वर्ष दिन को दोनों के शरीर के टुकडे करके औरंगजेब ने हत्या कर दी। किन्तु ऐसा कहते हैं कि हत्या पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा की मेरे 4 पुत्रों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता.

जब छत्रपति संभाजी महाराज के टुकडे तुलापुर की नदी में फेंकें गए तो उस किनारे रहने वाले लोगों ने वो इकठ्ठा करके सिल के जोड़ दिए (इन लोगों को आज “शिवले” इस नाम से जाना जाता है) जिस के उपरांत उनका विधिपूर्वक अंत्यसंस्कार किया.

औरंगजेब ने सोचा था की मराठी साम्राज्य छत्रपति संभाजी महाराज की मृत्यु पश्चात ख़त्म हो जाएगा। परंतु उसका सोचना गलत था, छत्रपति संभाजी महाराज की हत्या की वजह से सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे| अत: औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा| उसका दक्खन जीतने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया.

इतने बड़े साहसी और उत्तम शासक होने के बावजूद कम जानकारी के कारण उनका चरित्र एक चरित्रहीन तथा व्यसनी राजा का दिखाया गया है| इसके साथ ही यह काफी अचम्भे की बात है के छत्रपति संभाजी महाराज के बारे में लिखी गयी बाते उनकी मृत्यु के पश्चात 100 साल गुजरने पर लिखी गयी.

संभाजी महाराज और औरंगजेब का संघर्ष सत्ता का संघर्ष था| धर्मवीर छात्रपती श्री संभाजी महाराज का ये बलिदान और उनको पीडा देने का काम मुगलों ने औरंगजेब के कहने पर एक महिने तक चालु रखा और उनको महिना भर तडपाते रहे और आखिर में उनके शरीर के पैरों से लेकर गर्दन तक तुकडे तुकडे करके मार डाला.

ये सब होने से पहले क्रुरकर्मा और धर्मांध औरंग ने उन्हें अपना हिन्दुधर्म त्याग कर मुगलों का मुस्लिम धर्म अपनानें की मांग रखी थी लेकिन युगप्रवर्तक हिन्दु राजा छत्रपती श्री शिवाजी राजें का बेटा और अपने हिन्दु धर्म पर पुरी निष्ठा और श्रद्धा रखनें वाले धर्मवीर छत्रपती श्री संभाजी राजें ने ये मांग ठुकरा दी और इस्लाम का स्विकार कतई न करनें का निश्चय औरंग को बता दिया था|

इससें क्रोध में आकर औरंगजेब ने उनको पुरा महिना भर तडपा-तडपा के मारा था| ये पुरा महिना ॥ श्री शिव प्रतिष्ठान हिन्दुस्थान॥ नामक संघटन की और से पुरे भारत देश में जहा-जहा इस संघटन का काम है वहा वहा इस धर्मवीर छत्रपती श्री संभाजी राजें के श्रद्धांजली का पुरे तौर पर पालन किया जाता है.

उसे ॥ धर्मवीर बलिदान मास ॥ कहते है| जिस में श्री संभाजी महाराज को पकडने के समय सें उनका बलिदान होने तक का पुरा महिना होता है और ये बलिदान मास जो पुरा महिना भर चलता है जिसमे ये सब लोग श्रद्धांजली के रुप में अपनी चहेती कोई भी एक चीज, उदाहरण के तौर पें-

  1. चाय पिना
  2. मीठा खाना
  3. मुंडन करना
  4. पैरों मे चप्पल न पहनना
  5. दिन में एक बार ही खाना
  6. व्यसन है तो उसको त्याग देना
  7. खुशी न मनाना
  8. टीवी देखना छोड़ना

इत्यादि जैसे चीजो का पुरा त्याग कर देते है, और हिन्दुसमाज के उपर धर्मवीर श्री संभाजी महाराज के अनंत उपकार होने हेतु पुरे हिन्दु समाज को भी ये बलिदान मास श्री संभाजी महाराज को श्रद्धांजली के तौर पे पालन करने की विनती भी करते है.

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Himanshu Grewal

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