बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम – सरकारी योजना – बेनामी संपत्ति की शिकायत करने पर मिलेगा 1 करोड़ राशी तक का इनाम

बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम सरकारी योजना

नमस्कार, आज हम एक बड़ी ही जबर्दस्त सूचना लेकर आयें हैं जिसे सुन कर आपके होश उड़ जायेंगे| जी हाँ वैसे तो हमारा टाइटल पढ कर ही आपको अनुमान लग गया होगा की हम बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम के विषय में चर्चा कर रहे है.

ऐसे तो आज कल नई नई योजनाएं सुनने को मिल रही हैं लेकिन ये योजना सबसे अलग है| अगर आपके पास बेनामी संपत्ति, बेनामी लेनदेन है और अगर आपने उसका कोई पंजीकरण नहीं किया है तो सावधान रहिये क्यूंकि भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक नयी योजना का आरम्भ किया है जिसके तहत वित्त मंत्रालय ने अपनी योजना बनाई है और एक टीम बनाई है जो केवल उन संपत्तियों का डाटा तैयार करेंगे जिनका नाम अभी तक पंजीकृत नहीं हुआ है.

इस योजना के तहत यदि कोई भी व्यक्ति बेनामी संपत्ति की शिकायत टैक्स डिपार्टमेंट को देगा तो उसे 1 करोड़ रूपये की राशी इनाम के तौर पर सरकार देगी.

मित्रों, मै आपको बेनामी सूचनार्थी पुरस्कार के बारे में पूरी जानकारी दूंगा लेकिन उससे पहले आपको ये जानना होगा की बेनामी संपत्ति किसे कहते हैं ? बेनामी लेनदेन किसे कहते हैं और बेनामी संपत्ति का लेनदेन कितनी सीमा तक किया जाता है ?

बेनामी संपत्ति किसे कहते हैं – What is Anonymous Property in Hindi

बेनामी संपत्ति क्या होता है ?

जिसकी कीमत किसी और ने दी हो लेकिन सम्पत्ति पर नाम किसी और व्यक्ति का होता है| इस सम्पत्ति के अंतर्गत उन संपत्तियों का वर्णन किया जाता है जो अपनी पत्नी, बच्चों या किसी रिश्तेदार के नाम पर खरीदी गयी होती है| जिसके नाम पर ऐसी सम्पत्ति खरीदी गयी होती है, उसे “बेनामदार” कहा जाता है.

कई लोगों ने इसी तरह से अपने काले धन को बचाया हुआ है| बेनामी सम्पत्ति चल अचल य वित्तीय दस्तावेजों के रूप में भी हो सकती है.

साधारण रूप से बेनामी संपत्ति ऐसे लोग खरीदते हैं जिनकी आय कम होती है और वो अपनी आय से ज्यादा की जमीन, दूकान, आदि खरीदते हैं.

ये जरुरी नहीं है की बेनामी संपत्ति को लेने वाला काला धन ही लगाता है इसकी वजह ये भी होती है की उदाहरण से समझिये|

बेनामी संपत्ति किसे कहते हैं – बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम योजना

बेनामी संपत्ति किसे कहते हैं ?

जैसे “राम की आय 15000 रु महीना है और उसने 300000 रु की जमीन अपने भाई बहन दोस्त आदि के साथ मिल कर खरीदी है| अब ये भी हो सकता है की उसने ये जमीन अपने रिश्तेदारों में किसी एक की करवा रखी हो.

इसमें संपत्त‍ि के एवज में भुगतान करने वाले के नाम से कोई वैध दस्तावेज (valid document) नहीं होता है। ऐसे मामलों में बेनामी लेनदेन में शामिल दोनों पक्षों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

किसी व्यक्ति ने बेनामी सम्पत्ति उसके नाम से खरीदी हो जो कभी आयकर रिटर्न नहीं भरता है तो ये उसकी बेनामी संपत्ति कहलाएगी.

इस स्थिति में सरकार को किसी संपत्ति पर संदेह होता है तो वो उस संपत्ति के मालिक से पूछताछ कर सकती है और उसे नोटिस भेजकर उससे उस प्रॉपर्टी के सभी कागजात मांग सकती है जिसे मालिक को 90 दिनों के अंदर दिखाना होगा और यदि जाँच में कुछ गड़बड़ पाया गया तो उस पर कड़ी कार्यवाही होती है.

बेनामी लेनदेन सूचनार्थियों पुरस्कार योजना की सम्पूर्ण जानकारी

बेनामी लेनदेन अधिनियम सूचनार्थियों पुरस्कार योजना की सम्पूर्ण जानकारी निम्नलिखित है.

सबसे पहले तो आपके मन में एक ही सवाल आया होगा की बेनामी लेनदेन सूचनार्थियों पुरस्कार योजना है क्या ?

आयकर विभाग, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (Income Tax) जो कि हम सभी भारतीय लोगों की आय का टैक्स लेती है| और सरकार को टैक्स की कमाई का एक बड़ा भाग देती है जिससे सरकार अपने भारत का निर्माण करती है.

आयकर विभाग सब पर नजर भी रखती है की कोन कितना टैक्स भर रहा है| काला धन वह धन होता है जो की कुछ लोग हैं अपने कर में से बचा लेते हैं जैसे की टैक्स बना 1,00,000 रूपये और जमा किया केवल 75,000 रूपये कोई न कोई खर्चे ऐसे दिखा दिए जाते है जो की अमान्य है.

आयकर विभाग ने काले धन की खोज करने के लिए और कर चोरी करने वालों के खिलाफ नयी योजना का प्रारम्भ किया है “बेनामी संपत्ति लेनदेन सूचना पुरस्कार योजना|”

इस योजना के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति उन लोगों के बारे में जो कर चोरी करते हैं नकद लेन देन बड़ी मात्रा में करते है और कर भुक्तान नहीं करते हैं| इन व्यक्तियों के बारे में बताएगा और सही जानकारी देगा तो सरकार की तरफ से उसे 1 करोड़ का इनाम मिलेगा.

यदि किसी विदेशी व्यक्ति ने भी ऐसी जानकारी दी तो उसे भी 1 करोड़ का इनाम मिलेगा और उस व्यक्ति की जानकारी गुप्त रखी जाएगी चाहे वो देश का हो या फिर विदेशी व्यक्ति हो.

भारत वैसे तो प्रगति पर है मगर आज भी कहीं न कहीं गरीबी भारत का हिस्सा बनी हुई है इस गरीबी को तभी खत्म किया जा सकता है. जब देश का युवा जागरूक हो.

बेनामी लेनदेन सुचनार्थियों पुरस्कार योजना ये एक नयी योजना है| भारत के लिए आवश्यक है की किसी भी प्रकार से काले धन को भारत के विकास में प्रयोग किया जाये.

बेनामी लेनदेन के तहत लोगों को बेनामी लेनदेन और संपत्तियों के साथ-साथ ऐसे छिपे निवेशकों और लाभकारी मालिकों के बारे में बताती है जो गैर क़ानूनी काम करते हैं.

बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम – Benami Transactions Prohibition Act in Hindi

भारतीय संसद द्वारा बेनामी लेनदेन का नियम लागू है| बिना किसी पुख्ता सबूत के किसी भी प्रकार की लेनदेन गैर क़ानूनी मानी जाती है जिसको मध्य नजर रखते हुए सरकार ने यह सन् 1988 में पारित किया और बाद में सन् 2016 में इसी नियम का संशोधन किया गया.

बेनामी लेनदेन के नियम का संशोधन 1 नवम्बर 2016 को पुनिर्मित किया गया था| संसोधन में ये बात साफ़ साफ लिखी ही की बेनामी संपत्ति को जब्त कर लिया जाएगा और फिर सील करने का अधिकार है| साथ ही, जुर्माने के साथ जेल की सजा भी लिखित है.

इस अधिनियम के तहत बेनामी लेनदेन करने पर तीन साल की जेल और जुर्माना या दोनों का प्रावधान है और उस प्रॉपर्टी की बाजार कीमत पर 25% जुर्माने का प्रावधान है| बाद में संसोधन किया गया और तीन साल की जगह 7 साल की सजा कर दी गयी|

कुछ लोग जो जानबूझकर गलत जानकारी देते है उन पर संपत्ति के बाजार मूल्य का 10 प्रतिशत तक जुर्माना और 6 महीने से 5 साल तक की जेल का प्रावधान रखा गया है| नया कानून घरेलू काला धन जैसे की जो रियल स्टेट सेक्टर में लगे काले धन की जाँच के लिए लाया गया है.

बेनामी संपत्ति खरीदने के बारे में मुख्य बातें जो जान लेनी चाहिए :

  1. किसी भी सम्पत्ति को खरीदते समय खरीदने वाला अपने पैसे से और किसी के नाम पर सम्पत्ति कराता है तब उस सम्पत्ति को बेनामी सम्पत्ति माना जाता है| ये क़ानूनी शब्द है जिसे हमें हर हाल में मानना होता है साथ में इस बात पर गौर करना है कि खरीद में लगा पैसे आमदनी के ज्ञात स्रोतों से बाहर का होना चाहिए| भुगतान चाहे सीधे तौर पर भी किया जाए या फिर घुमा फिराकर किसी और तरीके से|
  2. खरीददार बेनामी सम्पत्ति को बेशक अपने ही किसी परिवार के सदस्य के नाम ही क्यों न ले तब भी इस सम्पत्ति को बेनामी सम्पत्ति ही कहा जाएगा| सधारण भाषा में खरीददार सम्पत्ति का मालिक तो है लेकिन क़ानूनी रूप से नहीं है लेकिन उसका कब्जा उस सम्पत्ति पर पूरा होता है.
  3. सन् 1988 के कानून में 1 नवम्बर 2016 को संशोधन हुआ है जिसकी वजह से केंद्र सरकार को ऐसी सम्पत्ति को जप्त करने का पूरा हक़ है.
  4. बेनामी संपत्ति की लेनदेन के लिए दोषी पाए गए व्यक्ति को सात साल तक की कैद की सजा और सम्पत्ति के बाजार मूल्य के 25% के बराबर भुगतान लगाया जा सकता है|
  5. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से काले धन पर जांच के लिए गठित की गई कमिटी ने 3 लाख रूपये से ज्यादा के नकद लेनदेन पर रोक लगाए जाने की सिफारिश की थी।
बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम सूचनार्थियों पुरस्कार योजना का उद्देश्य क्या है ?

वैसे तो कोई भी योजना नियम कानून बिना किसी उद्देश्य के नहीं होते हैं सिर्फ उद्देश्य सकारात्मक होना चाहिए| सरकार द्वारा जो भी कदम उठाती है उसमे हम सभी का भला होता है| इस योजना के मुख्य उद्देश्य काले धन को बाहर निकालना और कर चोरी को जड़ से खत्म करना है.

इस कदम से लोगों के बीच विश्वास जाग उठा है लोगों को सरकार पर भरोसा होता है जिससे लोग कानून का पालन करते हैं और नयी नयी योजनाओं में हाथ बढ़ाते हैं| इस कदम से आयकर विभाग, आयकर छुपा निवेशकों और लाभकारी मालिकों द्वारा ऐसी संपत्तियों पर अर्जित आय के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सक्षम होगा.

बेनामी संपत्ति लेनदेन सूचनार्थियों पुरस्कार योजना के अनर्तगत कितना इनाम मिलेगा और गवाह का नाम जानकारी छिपी रहेगी या नहीं ?

कोई भी व्यक्ति चाहे देशी हो या विदेशी आयकर विभाग निदेशालय के जाँच निदेशकों में बेनामी निषेध इकाई के संयुक्त / अतिरिक्त आयुक्तों को सही जानकारी दे कर 1 करोड़ रूपये का इनाम जीत सकते हैं.

जानकारी देने वाले व्यक्ति का नाम पता सब गुप्त रखा जाएगा और इसे सार्वजनिक नहीं किया जायेगा या फिर जगजाहिर नहीं होने देंगे| अगर उसकी जानकरी किसी कारण वश गलत साबित होती है तो इनाम नही मिलेगा और समय बर्बादी के लिए उस पर उचित कार्यवाही की जाएगी.

इनकम टैक्स चोरी इनफार्मेशन – बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम

इनकम टैक्स चोरी के चलते सरकार को कई प्रकार के कदम उठाने पड़े हैं जिसमे एक ये भी है जो कोई ही इनकम टैक्स की चोरी करने वालों की रिपोर्ट आयकर विभाग को देगा उसे 50 लाख रूपये की इनाम राशी दी जाएगी.

संशोधित आयकर सूचनार्थियों के लिए पुरस्कार योजना के तहत, आईटी अधिनियम ‘61 के तहत क्रियान्वित भारत में आय या परिसंपत्तियों पर टैक्स की पर्याप्त चोरी के बारे में आईटी विभाग में जाँच निदेशकों के नामित अधिकारीयों को निर्धारित तरीके से जानकारी देने के लिए 50 लाख रूपये तक का इनाम दिया जायेगा.

गुप्त स्थानों पर जमा काले धन की जानकारी देने पर इनाम कितना है – Black Money News in Hindi

गुप्त स्थान जैसे विदेशों में बैंक आदि में जमा पैसा भी गुप्त जमा राशि कहलाती है जैसे स्विस बैंक.

यदि इनकी जानकरी किसी ने आयकर विभाग को दी है तो 5 करोड़ तक का इनाम दिया जा सकता है.

बेनामी संपत्ति लेनदेन की जानकारी आयकर विभाग तक कैसे पहुंचा जाये?

बेनामी संपत्ति की जानकारी आप सीधे आयकर विभाग जा कर भी दे सकते हैं और आयकर विभाग की अपनी वेबसाइट भी है आप वहां जा कर एप्लीकेशन भी दे सकते है.

मै उम्मीद करता हूँ की आपको बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम योजना के बारे में पूरी जानकारी मिल चुकी है और यदि आपको किसी अन्य विषय पर जानकारी चाहिए तो आप हमें कमेंट के माध्यम से भी बता सकते है.

हम आपके लिए जल्द से जल्द नये लेख लेकर उपस्थित रहेंगे| ज्यादा से ज्यादा इस लेख को शेयर करों ताकि लोगों को भी तो पता चले की बेनामी लेनदेन होता क्या है ? आप इस लेख को व्हाट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर आदि पर शेयर भी कर सकते है. “धन्यवाद”

भारत सरकार की योजनाएं ⇓

सिकंदर महान की कहानी, जीवन परिचय (भारत पर आक्रमण) व उनकी मृत्यु कब और कैसे हुई ?

सिकंदर महान की कहानी और जीवन परिचय

सिकंदर महान की कहानी : सिकंदर महान का जन्म 20 और 21 जुलाई 356 ई पू को मैसिडोनिया में हुआ था| (यह यूनान में है) सिकंदर मेसेडोनिया का ग्रीक शाषक था| इतिहास मै सिकंदर को महान और सबसे अधिक यशस्वी शासक माना गया है.

सिकंदर ने मैसिडोनिया, फिनिशिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया, सीरिया , मिस्र तथा भारत में पंजाब तक के प्रदेशों पर अपना कब्जा जमा लिया था| यह हिस्सा पूरी पृथ्वी का सिर्फ 5 चौथाई हिस्सा ही था.

सिकंदर महान की कहानी

सिकंदर महान के पिता और माता का क्या नाम था ?

सिकंदर के पिता फिलिप द्वितीय (अंग्रेजी : Philip II of Macedon) और सिकंदर की माता का नाम ओलंपियाज था|

सिकन्दर जब 16 वर्ष का था तब वह अरस्तु से शिक्षा प्राप्त करके सिकंदर अपने राज्य में वापस आ गया था और जब वह अपने राज्य वापस आया था तभी फिलिप ने  बेजान्टियम के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था और सिकंदर को अपने राज्य का प्रभारी बनाकर राज्य की देख रेख के लिए छोड़ दिया.

जब फिलिप वहा उपस्थित नही था तब थ्रेसियन मैदी ने मैसिडोनिया के खिलाफ विद्रोह कर दिया था| सिकंदर बहुत बहादुरी से उन्हें वहा खदेड़ कर भगा दिया और बाद में उसी इलाके में सिकंदर ने यूनानी लोगो के साथ एक उपनिवेश स्थापित करके अलेक्जेंड्रोपोलिस नामक शहर की स्थापना की थी.

फिलिप वापस लोटा तो उसे अपने सेनापती अटलुस की भतीजी क्लियोपेट्रा ईरीडिइस से प्यार हो गया था| फिलिप ने उससे विवाह कर लिया| इस विवाह से सिकंदर की उत्तराधिकारी की दावेदारी संकट में आ चुकी थी क्यूंकि फिलिप का होने वाला पुत्र पुरे तरीके से उत्तराधिकारी होता.

सिकन्दर अपनी माँ को लेकर मेसेडोनिया से भाग गया और अपनी माँ को अपने मामा के यहा छोड़ आया और खुद इलियारिया चला गया| वहा जाकर उसने इलियारिया के राजा से संरक्षण की मांग की जबकि कुछ साल पहले वह सिकन्दर से हारा था फिर भी उसने सिकंदर का अथिथि के रूप में स्वागत किया.

जब सिकन्दर 11 साल का था तो उसके पिता फिलिप की हत्या कर दी गयी थी| ऐसा कहा जाता है की सिकंदर की माँ ने अपने पती को जहर देकर मार दिया था|

अपने पिता की मृत्यु हो जाने के बाद सिकन्दर ने अपने सोतेले भाई और अपने चचेरे भाइयों को मार कर मकदूनिया की राज गद्दी हासिल की थी

पोरस और सिकन्दर का युद्ध – Alexander and Porus Story in Hindi

Alexander and Porus Story in Hindi

पंजाब में झेलम से चेनाब नदी तक राजा पुरूवास (पोरस) का राज्य था| राजा पुरूवास को ही ‘पोरस’ कहा जाता है|

राजा पोरस पुर्व के वंशज थे| अपने आस पास के सभी राज्य में राजा पोरस को सबसे शक्तिशाली माना जाता है| उस समय सिकंदर ने विश्व विजय की ठानी हुई थी और वह अपने इस लक्ष्य को लेकर पोरस के राज्य तक आ चूका था.

तक्षशिला के राजा ने सिकंदर के आगे घुटने टेक दिए थे लेकिन पोरस हार मानने को तैयार नही था| वह अपनी सेना के साथ सिकन्दर से युद्ध करता रहा और फिर पोरस को काफी संघर्ष के बाद सिकंदर से हार माननी पड़ी|

सिकन्दर की सेना में 50 हजार सैनिक थे और पोरस की सेना में 20 हजार सैनिक थे| पोरस की सेना में हाथी भी थे| युद्ध के समय पोरस ने सिकंदर की सेना के सामने अपने हाथी भी खड़े कर दिए थे जिससे सिकंदर भी दंग रह गया था|

जब इस युद्ध के बाद पोरस को सिकंदर के सामने प्रकट किया गया तब सिकन्दर से पोरस से पूछा आपके साथ केसा व्यवहार किया जाये ? तब पोरस ने बहुत ही आत्मविश्वास के साथ यह जवाब दिया|

“मेरे साथ ऐसा व्यवहार हो जैसा एक शासक दुसरे शासक के साथ करता है|”

सिकन्दर को पोरस का आत्मविश्वास भरा जवाब बहुत पसंद आया इस तरह सिकंदर और पोरस के बीच दोस्ती का सम्बन्ध स्थापित हो गया था|

सिकंदर उत्तराधिकारी के रूप में – सिकंदर महान की कहानी

जब फिलिप की मृत्यु हुई तो राज्य में विद्रोह होने लगे, लोग लड़ने लगे| सिकंदर ने इस समस्या को बड़ी साझेदारी से लिया| सिकंदर ने कूटनीति का उपयोग करके अपनी सेना में 3000 घुड़सवार सैनिकों का गठन कर दिया था तभी उसे खबर मिलती है की थिसलियन की सेना ओलम्पस पर्वत और ओसा पर्वत के बीच कब्जा किये हुए है.

सिकंदर ने अपनी सेना को ओसा पर्वत पर चढ़ने का आदेश दिया और सिकंदर की सेना ने थिसलियन की सेना को पीछे की और से घेर लिया और थिसलियन की सेना ने घुटने टेक आत्मसमर्पण कर दिया| फिर सिंकदर ने उस सेना को भी अपनी सेना में मिला लिया और वह दक्षिण की और कुच करने लगा|

जब  सिकंदर दक्षिण की और बढ़ रहा था तब एथेंस ने शांति की गुहार लगाई और सिकंदर इस बात को मान गया और विद्रोहियों को माफ़ कर दिया.

सिकंदर का भारत पर आक्रमण कब हुआ और क्या प्रभाव पड़ा – Sikandar Mahan History in Hindi

सिकंदर ने 326 ईसा पूर्व भारत पर आक्रमण किया था| कुछ इतिहासकार का कहना है की सिकंदर का भारत पर कभी आक्रमण हुआ ही नहीं था| पहले भारत और पाक एक ही थे जिस जगह सिकंदर का आक्रमण हुआ था वह जगह पाक में है|

कहा जाता है की सिकंदर सिंध नदी को पार नहीं कर पाया था| सिकंदर ने काबुल पर आक्रमण किया और उस जगह को सिकंदरिया नामक नाम दिया इसके बाद सिकंदर पश्चिम गांधार तक जा पंहुचा यहां पर पुष्कलावती के शासक ने सिकंदर का घोर प्रतिकार किया.

सिकंदर का सबसे अधिक प्रतिकार अशोक के राज्य में हुआ| अशोक की राजधानी मसग थी। इसके बाद स्त्रियों ने इमके प्रतिकार किया|

स्त्रियों को रास्ते से हटाने के लिए सभी का कत्लेआम कर दिया गया| इसके बाद सिंधु नदी के पश्चिमी भाग पर अधिपत्य कायम किया| फिलिप के नेतृत्व में एक सैनिक टुकड़ी रख दिया|

जब  सिकंदर ने भारत की और आक्रमण किया तब यूनानियों ने यहां आकर ज्योतिष विद्या का ज्ञान प्राप्त किया|

सिकंदर महान की मृत्यु कब और कैसे हुई – Alexander Death History in Hindi

जब सिंकदर की सेना थक गयी थी और वह वापस अपने राज्य जा रहा था तब रास्ते में सिकंदर की एक रोग के कारण मृत्यु हो गयी थी|

इतिहासकारों का कहना है की भुखार की वजह से सिकंदर की मृत्यु हुई थी| जब सिकन्दर की मृत्यु हुई तो वह तैंतीस साल का था| उसकी अर्थी के सामने लोग सैकड़ों की गिनती में थे| लोग उसकी अर्थी देखने के लिए कब से खड़े हुए थे.

बचपन से ही विश्व विजेता बनने का सपना देखने वाला सिकंदर जब मरा तो उसकी दोनों बाहें फेली हुई थी| लोग इसी आश्चर्यजनक बात को देखने के लिए उसकी अर्थी को देखने आये थे की उसके हाथ खुले क्यों है क्या किसी ने भी ध्यान नही दिया लेकिन यह सिकंदर की इच्छा थी की मरने के बाद उसके हाथ खुल जाये जिससे सभी को पता चले की चाहे कोई कितना भी धन क्यों न करले लेकिन जाते सब खाली हाथ ही है.

सिकंदर की कहानी मै बस इतना ही| उम्मीद है की आपको सिंकदर महान की कहानी पढ़ कर अच्छा लगा होगा|

आपको सिकंदर महान की कहानी पढ़ कर क्या सिख मिली हमको कमेंट बॉक्स में जरुर बताये अथवा इस लेख को जितना हो सके उतना सोशल मीडिया पर शेयर करें.

इतिहास के प्रसिद्ध व्यक्ति ⇓

महाभारत ⇓

NCC क्या है ? राष्ट्रीय कैडेट कोर की सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

NCC क्या है और फायदे हिंदी में

NCC क्या है बताने से पहले में आपको एनसीसी की फुल फॉर्म बता देता हूँ.

NCC की फुल फॉर्म राष्ट्रीय कैडेट कोर है यह भारत का सैन्य कैडेट कोर है जो छात्र और छात्राओं को सैन्य प्रशिक्षण प्रदान करता है| इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है यह देश के युवाओं को जागृत करने और उनमे जोश लाना और सेना में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करता है.

एनसीसी स्वैच्छिक रूप से स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए खोला गया है| हमारे भारत की नौसेना, वायु सेना, थल सेना इन NCC Cadet को ट्रेनिंग देती है.

सबसे पहले एनसीसी की शुरुआत जर्मनी में हुई थी| भारत में एनसीसी की शुरुआत 1948 में हुई थी.

सेना की कमी के कारण एन सी सी की उत्पत्ति की गयी थी| एनसीसी के तीन सर्टिफिकेट होते है| ‘A’,’B’, ‘C’ ये तीन सर्टिफिकेट एनसीसी कैडेट प्राप्त कर सकता है.

इन तीनो सर्टिफिकेट में प्रवेश करने के नियम अलग अलग होते है| एनसीसी को तीन स्कन्ध में बाँटा गया है:-

  1. थल सेना
  2. वायु सेना
  3. नौसेना

ठाठ एनसीसी कैडेट को प्रशिक्षण के आधार पर तीन डिवीज़न में बाटा गया है:-

  1. सीनियर डिवीजन
  2. जूनियर डिवीजन
  3. गर्ल्स डिवीजन

अब देश में 15 लाख से ज्यादा एनसीसी कैडेट है जबकि इसकी शुरुआत के समय यह सिर्फ 20,000 के साथ ही शुरू हुई थी.

NCC का मोटो एवं उद्देश्य – NCC क्या है ?

एनसीसी का मोटो ‘एकता और अनुशासन’ है| ‘unity and discipline’

NCC के मोटो को 12 अक्टूबर, 1980 को अपनाया गया था|

NCC के तीन मुख्य उद्देश्य है:-

  1. देश के युवाओं में चरित्र सहचर्य, नेतृत्व, अनुशासन, धर्मनिरपेक्षता, रोमांच और निस्वार्थ सेवा भाव का संचार करना|
  2. संघटित प्रशिक्षित व् प्रेरित युवाओं का एक मानव संसाधन तैयार करना जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान करना व् देश की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना|
  3. सशस्त्र सेना में करियर बनाने के लिए युवाओं को प्रेरित करना और उचित वातावरण प्रदान करना|

एनसीसी गीत के बोल – NCC क्या है ?

NCC गान ‘हम सब भारतीय है’ यह सभी NCC कैडेट को अच्छे से याद रहता है इसके उद्देश्य एनसीसी कैडेट्स के मन से भेदभाव की भावना दूर कर सबको एकता का मार्ग दिखाना है.

हम सब भारतीय है गीत के लेखक सुदर्शन फ़ाकिर है इनको अपने पहले गाने के लिए ही फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था.

एनसीसी ध्वज – What is NCC in Hindi

एनसीसी का ध्वज तिन रंगों की पट्टी में बना हुआ है|

  1. पहली पट्टी लाल रंग की है|
  2. बीच वाली पट्टी नीले रंग की है|
  3. तीसरी पट्टी आसमानी रंग की है जो क्रमशः: थल सेना, वायु सेना, नो सेना को दर्शाता है|

ध्वज के बीच में दो गेहूं की बालियां बनी है| ध्वज के मध्य में एनसीसी शब्द स्वर्ण रंग से NCC का ध्येय सूत्र या मोटो ‘एकता और अनुशाशन’ लिखा होता है|

एनसीसी में शामिल होने के नियम – Information About NCC in Hindi

राष्ट्रीय कैडेट कोर में नामांकन अपनी इच्छा के अनुसार होता है| कैंडिडेट तेरह वर्ष की आयु में एनसीसी में शामिल हो सकता है| यह प्रशिक्षण दो वर्ष का होता है|

यहाँ आपकी उम्र तेरह वर्ष से सत्रह से अठारह वर्ष तक होती है| यहा प्रशिक्षण आपको स्कूल के अंतरगर्त दिया जाता है इसे जूनियर डिवीज़न कहते है और इसके बाद आप जब विद्यालय में पहुच जायेंगे तब आप बचे एक साल का प्रशिक्षण करेंगे| यहा आप सीनियर डिवीज़न में होंगे.

यदि आप एनसीसी में प्रवेश चाहते है तो कक्षा ग्यारह में इसे स्कूल में एडमिशन ले जहा पर NCC हो| वहा आपको NCC मिल जाएगी|

अगर आप बारहवी पास कर चुके है तो आप इसे डिग्री कॉलेज में प्रवेश ले जहा पर NCC का प्रशिक्षण दिया जाता हो| वहा आप ग्रेजुएशन के साथ साथ एनसीसी का तीन साल का प्रशिक्ष्ण पूरा कर लेंगे.

एनसीसी के दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का समापन – NCC Information For Schools in Hindi

एनसीसी में कई तरह के शिविर लगाये जाते है जिनमे अलग अलग रूप से कैडेट्स को प्रशिक्षण दिया है | यहा पर कैडेट की पूरी जिम्मेदारी एनसीसी की ही होती है.

कैडेट को उसकी बटालियन से लेकर जाने से शुरू करने से पूरे दस दिन का प्रशिक्षण देने के बाद वापस उसकी बटालियन तक ही छोड़ने की पूरी जिम्मेदारी एनसीसी की होती है|

अब मै आपको कुछ एनसीसी शिविर के नाम बताता हूँ|

  1. एनुअल ट्रेनिंग कैंप
  2. इंटर ग्रुप कंपटीशन कैंप
  3. थल सेना कैंप
  4. नो सेना कैंप
  5. वायु सेना कैंप
  6. रोक स्लीपिंग कैंप
  7. आल इंडिया ट्रैकिंग कैंप
  8. एडवेंचर ट्रेनिंग कैंप
  9. आल इंडिया माउंटेन ट्रेनिंग कैंप
  10. पैरा ट्रेनिंग कैंप
NCC के फायदे – NCC Profit in Hindi – NCC क्या है ?

एनसीसी के सर्टिफिकेट ‘C’ के धारक के लिए रक्षा सेवा में कमीशन हेतु निम्न पद आरक्षित है|

  • आर्मी ⇒ IMA [इंडियन मिलिट्री एकेडमी] देहरादून और SSB के INTERVIEW में प्रत्येक वर्ष 64 रिक्तिया OTA  [ऑफिसर ट्रेनिंग एकेडमी] चेन्नई शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए प्रतिवर्ष 100 रिक्तिया|
  • नौसेना ⇒ प्रत्येक कार्य के लिए 6 रिक्तियां और SSB इंटरव्यू में पॉइंट्स|
  • एयर फोर्स ⇒ उड़ान प्रशिक्षण कोर्स सहित सभी कोर्स में 10 प्रतिशत कवक SSB साक्षात्कार सैनिक, नो सैनिक, वायु सैनिक की भर्ती में 5 से 10 प्रतिशत तक बोनस अंक दिए जाते है और जिन धारको के पास ‘C’ सर्टिफिकेट होता है उनकी कोई लिखित परीक्षा नहीं होती है छूट दी जाती है|

डिग्री कॉलेज में प्रवेश लेने पर यदि प्रवेश होने में समस्या आती है या अंक कम होते है तो आपको एनसीसी कैडेट होने की वजह से प्रवेश होने में समस्या नही आएगी और एनसीसी कैडेट होने की वजह से आपके अंको में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी.

आज मैंने आपको एनसीसी के बारे में बताया है| अब मै आप सबको एक बात और बतादू की एनसीसी ईएसआई संस्था है जहा आपको हर चीज सरकार द्वारा दी जाती है.

जब भी आप किसी शिविर में जायेंगे तब आपसे कोई पैसा नही लिया जायेगा| आपका आने जाने रहने खाने पिने सभी का पैसा सरकार देती है.

एनसीसी एक अकेली संस्था ईएसआई है जहा कैडेट को सेना की तरह का प्रशिक्षण बिलकुल निशुल्क दिया जाता है| आप सबको एनसीसी में प्रवेश अवश्य लेना चाहिए इससे आपके व्यक्तित्व में एक अलग ही रूप आ जायेगा और आप बाकि समान्य लोगो से कुछ अलग लगेंगे एनसीसी आपको प्रभावित भी बनाती है.

आज मैंने आपको NCC क्या है के बारे में सब कुछ बता दिया है| अगर आपको अन्य कुछ पूछना है तो कमेंट के जरिये पूछ सकते है अथवा अगर आप अपनी कुछ बात शेयर करना चाहते हो तो कमेंट के माध्यम से अपनी बात हमारे साथ शेयर कर सकते हो.

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सम्पूर्ण महाभारत भाग 1 – Mahabharat Katha Part 1

महाभारत की पूरी कहानी

परिचय ⇒ महाभारत हिन्दुओ का एक महान ग्रन्थ है| यह एक सबसे महान काव्य है इसे केवल भारत भी कहा जाता है यह विश्व का सबसे लम्बा ग्रन्थ है इसके मुख पात्र भगवान श्री कृष्ण, युधिष्ठिर अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और दुर्योधन है| महाभारत की पूरी कहानी के रचनाकार वेदव्यास जी को माना जाता है.

वेदव्यास जी को महाभारत लिखने में पूरे तीन वर्ष लगे थे यह ग्रन्थ अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतिक है|

वेदव्यास जी ने मन ही मन में मनन करके योग में स्थित होकर महाभारत की सम्पूर्ण घटनाओं का ज्ञान कर लिया था लेकिन इसके बाद उनके पास एक समस्या आ खड़ी हो गयी थी की वो कैसे काव्य के ज्ञान को साधारण जन तक पहुचाये क्यूंकि यह बहुत जटिल और बहुत लम्बा था तो इसके लिए उनको किसी व्यक्ति की जरूरत पड़ी जो की बिना गलती के वेदव्यास जी को सुनकर लिखता चला जाए.

वेदव्यास जी ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान गणेश जी के पास गये और गणेश जी मान गये परन्तु गणेश जी ने यह शर्त रखी की अगर वो एक बार कलम उठा लेंगे तो फिर जब तक काव्य पूर्ण नही होगा तब तक वो कलम नीचे नही रखेंगे.

वेदव्यास जी ने थोड़ी चालाकी दिखाई उन्होंने भी गणेश जी से शर्त रखी की जब वे कोई भी शलोक बोलेंगे तो गणेश जी को उस पर विचार करना होगा तो जब गणेश जी श्लोक पर विचार करते थे तब वेदव्यास जी और शोलोक सोच लेते थे|

परिणाम यह निकला की वेदव्यास जी ने सर्वप्रथम मनवो के उपाख्यानो सहित एक लाख श्लोकों का आदी भारत ग्रंथ बनाया|

परन्तु उपाख्यानो को छोडकर चोबीस हजार श्लोकों की भारत सहिंता बनाई इसके बाद वेदव्यास जी ने 60 लाख श्लोकों की भारत सहिंता बनाई जिसके तीस लाख शलोक देवलोक में, प्रन्द्रह लाख शलोक पितृ लोक में तथा चोदह लाख शलोक गन्धर्व लोक में समाद्रित हुए.

महाभारत में अठारह पर्व है और सों उपप्रव है| आपको मैंने महाभारत का संक्षिप्त परिचय तो दे दिया है अब इस महान काव्य का ज्ञान करने की और चलते है.

महाभारत भाग 1 – कुरु वंश की उत्पत्ति का इतिहास

Full Mahabharat Story in Hindi
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पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से अग्नि और अग्नि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ| पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए| ययाति से पुरु हुए पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए.

कुरु वंश में शांतनु का जन्म हुआ| शांतनु का विवाह माता गंगा से हुआ था जब शांतनु से गंगा का विवाह हुआ था तब गंगा ने उनसे एक वचन लिया था की वह कोई भी कार्य करे शांतनु उनसे कुछ नही पूछेंगे तब शांतनु ने गंगा को वचन दिया की वह उससे कभी कोई प्रश्न नही करेंगे और न ही किसी भी कार्य का कारण जानेंगे.

गंगा के आठ पुत्र हुए जिसमे से सात को वह अपने जल में गंगा में बहा चुकी थी और जब वह आठवे पुत्र को बहाने जा रही थी तब शांतनु ने उसे रोक लिया और वह आठवे पुत्र को जीवित देने का वचन देकर चली गयी.

जब वह पुत्र बड़ा हुआ तब वह उसे शांतनु को वापस देने के लिए आई और राजा शांतनु ने उसे सम्मान से अपना पुत्र स्वीकार किया उसका नाम देवव्रत था| इसके बाद राजा शांतनु ने सत्यवती से विवाह किया| सत्यवती के गर्भ से दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य.

जब राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करने वाले थे तब सत्यवती के पिता ने उन्हें कहा था की मेरी पुत्री का जो भी पुत्र होगा वही आगे चलकर राजा बनेगा तब राजा शांतनु ने विवाह करने से इनकार कर दिया था फिर देवव्रत ने अपने पिता का विवाह कराने का निर्णय लिया.

गंगा पुत्र देवव्रत ने यह प्रतिज्ञा ली की वे अपने होने वाले छोटे भाई को अपना अधिकार दे देंगे और उसे राज्य शाशन करने देंगे| उन्होंने आजीवन ब्रह्म्चर्य होने का निर्णय लिया.

जब महाराज शांतनु को यह बात पता चली की देव व्रत ने एसी प्रतिज्ञा ले ली है तो उन्होंने उसे ‘भीष्म’ नाम दिया| देवव्रत के भीष्म प्रतिज्ञा लेने की वजह से उनका नाम सदेव के लिए भीष्म पड़ गया उसी दिन से समस्त विश्व उनको गंगा पुत्र भीष्म कहकर बुलाने लगा और राजा शांतनु ने भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया.

एक बार हस्तिनापुर के नरेश दुष्यंत वन में गये जिस वन में दुष्यंत शिकार के लिए गये थे उसी वन में एक आश्रम था वह आश्रम कण्व ऋषि का था| यह बात जानकर ऋषि के दर्शन हेतु दुष्यंत उनके आश्रम में पहुच गये|

जब उन्होंने कण्व ऋषि को पुकार लगाई तो एक बहुत सुंदर कन्या उनके आश्रम से निकल कर बाहर आई और वह बोली “हे राजन महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये है परन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है”.

उस कन्या को देख कर दुष्यंत चकित रह गये और पूछने लगे आप कोन है महर्षि तो ब्रह्म्चर्य है तो कन्या बोली मेरा नाम शकुन्तला है मेरे माता पिता मेनका और विश्वामित्र है लेकिन वो मुझे वन में छोड़ गये थे| उसके बाद शकुन्त नामक पक्षी ने मेरा पालन किया और इसीलिए मेरा नाम शकुन्तला पड गया.

इसके बाद कण्व ऋषि की नजर मुझ पर पड़ गयी और वो मुझे अपने साथ ले आये| उन्होंने ही मेरा पालन पोषण भरण सब किया उन्होंने पिता की तरह मेरा पालन किया इसीलिए वो मेरे पिता है.

शकुन्तला की बातो को जानकर महाराज दुष्यंत बोले की तुम शत्रिय कन्या हो मै तुमसे विवाह करना चाहता हूँ और शकुन्तला को महाराज प्रिय भी लगने लगे थे वह विवाह के लिए मान गयी दोनों ने एक दुसरे से विवाह कर लिया.

कुछ काल तक महाराज शकुन्तला के साथ वन में ही रहे फिर एक दिन वो शकुन्तला से बोले प्रिय मुझे अपना राज्य भी संभालना है इसीलिए मुझे अपने राज्य की और प्रस्थान करना होगा जब ऋषि आ जायेंगे तब मै उनकी अनुमति से तुम्हे अपने महल ले चलूँगा|

ऐसा कह कर महाराज अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में शकुन्तला को स्वर्ण मुद्रा देकर चले गये|

कुछ समय बाद आश्रम में ऋषि दुर्वासा आये और महाराज दुष्ययंत के विरह में लींन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान नही हुआ और ऋषि दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझा और उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने शकुन्तला को शाप दे दिया की जिसके ध्यान में लीं होकर तूने मेरा अपमान किया है वह तुझे भूल जायेगा.

इस बात को सुनकर शकुन्तला होश में आ गयी और वह ऋषि से शमा याचना करने लगी तब उसे ऋषि ने शमा करते हुए कहा की अगर तेरे पास उसकी कोई प्रेम की निशानी है तो वह देखकर वह तुझे याद कर लेगा इसके बाद जब ऋषि कण्व वापस आये और शकुन्तला ने उनको सारी बात बताई तो उन्होंने कहा की पुत्री अब तुम विवाहित हो तुम्हारा अपने पती के घर जाना उचित है.

ऋषि कण्व ने अपने चार दासो के साथ अपनी पुत्री को राजा के महल भिजवा दिया लेकिन जब वह राजा के महल जा रही तब रास्ते में उसके प्रेम की निशानी दुष्यंत द्वारा दी हुई वह सोने की अंगूठी उससे एक सरोवर में गिर गयी और वह अंगूठी एक मछली खा गयी.

जब वह महल पहुची और ऋषि के दासो ने कहा महाराज शकुन्तला आपकी पत्नी है आप इन्हें स्वीकार करे तब महाराज ने उसके चरित्र पर ऊँगली उठाकर उन्हें अपमानित कर दिया जिसके बाद आकाश में जोर जोर से बिजली कडकी और शकुन्तला की माता मेनका आई और अपनी पुत्री को उठा कर ले गयी.

जिस मछली ने शकुन्तला की अंगूठी को निगल लिया था उससे एक मछुआरे ने पकड़ लिया और मछुआरे ने मछली को काटा तो उसमे से वह सोने की अंगूठी निकली उसने उस अंगूठी को राजा को उपहार में देने की सोची|

राजा ने वह अंगूठी देखी उनको सब कुछ याद आ गया और वो शकुन्तला की खोज में निकल पड़े उन्होंने हर जगह शकुन्तला का पता करवाया लेकिन उन्हें कुछ पता नही चला|

कुछ दिनों बाद महाराज देव इंद्र ने महाराज दुष्यंत को निमंत्रण दिया| जब वह वेद इंद्र के यहा से वापस आ रहे थे तब आकाश मार्ग से आते हुए उनकी नजर कश्यप ऋषि के आश्रम पर पड़ी वो उनके दर्शन के लिए वह चल पड़े|

वहा उन्होंने देखा की एक बहुत मनोहर बालक भयानक सिंह से खेल रहा है वह बालक शकुन्तला का था|

जब महाराज शकुन्तला पुत्र के निकट जा रहे थे तब उन्हें जाते हुए शकुन्तला की सखी ने देख लिया और वह चिल्ला कर बोली की महाराज आप भस्म हो जायेंगे अगर आप उस बालक को हाथ लगाएंगे तो लेकिन महाराज का ध्यान तो बालक की और था और वे उसे गोद में उठा कर खिलाने लगे.

जब उस स्त्री ने देखा की बालक के हाथ से बंधा हुआ काला धागा छुट कर नीचे गिर गया वह समझ गयी वे उसके पिता है| उस स्त्री ने सारी बात शकुन्तला को बताई और जब शकुन्तला आई तो महाराज धुश्यंत ने उन्हें पहचान लिया और वे उन्हें और अपने पुत्र को अपने साथ महल ले गये.

शकुन्तला के पुत्र का नाम भरत था और यह आगे चलकर महान प्रतापी सम्राट बना| हमारे देश का नाम भारतवर्ष भरत के नाम पर ही भारत बना|

कृपाचार्य और द्रोणाचार्य – Mahabharat Story in Hindi

महाभारत कथा हिंदी में भाग 1
गुरु द्रोणाचार्य

महाभारत : ऋषि गोतम के पुत्र का नाम श्रदां था| उनका जन्म बानो के साथ हुआ था उन्हें वेदाभ्यास में जरा सी भी रूचि नही थी और धनुर्विद्या से बहुत अधिक लगाव था वे धनुर्विद्या में इतने निपुण हो चुके थे की देवराज इंद्र भी उनसे भयभीत होकर रहने लगे थे.

इंद्र ने उनकी साधना भंग करने के लिए उनके पास एक देव कन्या को भेजा उस देव कन्या के प्रभाव से कृप नामक बालक पैदा हुआ और दुसरे भाग से कृपी नामक कन्या पैदा हुई.

कृप भी अपने पिता के समान धनुर्विद्या में बहुत निपुण साबित हुए| भीष्म जी ने क्र्प जी को ही पांडवों और कौरवों की शिक्षा के लिए नियुक्त किया.

गुरु द्रोण के साथ पर्षद नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे| ठाठ दोनों में प्रगाढ़ मंत्री हो गयी ठाठ उन्ही दिनों परशुराम अपनी समस्त सम्पत्ति को दान करके महेंद्र पर्वत पर तप कर रहे थे.

एक बार द्रोण उनके पास पहुचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया तब परशुराम बोले की वत्स तुम अब आये हो परन्तु तुम्हारे आने से पहले ही मै अपना सब कुछ दान कर चूका हूँ अब तो केवल मेरे पास अस्त्र शस्त्र बचे है तुम चाहो तो इनको ले सकते हो और यही गुरु द्रोणाचार्य चाहते थे|

उन्होंने भगवान परशुराम जी को बोला आपके अस्त्र शस्त्र पाकर मुझे बड़ी प्रसन्ता मिलेगी परन्तु आपको मुझे इन अस्त्र शस्त्र की शिक्षा भी देनी होगी तब परशुराम जी ने गुरु द्रोणाचार्य को अपना शिष्य मानकर अस्त्र शस्त्र का ज्ञान भी दिया.

शिक्षा प्राप्त करने के बाद गुरु द्रोणाचार्य का विवाह हो गया उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ| गुरु द्रोणाचार्य और कृपी का एक पुत्र हुआ जब वह पुत्र हुआ था तो उसके मुख से अश्व की भाति ध्वनी निकली थी इसी कारण उस पुत्र का नाम अश्वत्थामा रखा गया.

राजाश्रय प्राप्त ना होने के कारण द्रोण अपने परिवार के साथ निर्धनता में समय व्यतीत कर रहे थे| एक दिन अश्वत्थामा दूध पिने के लिए मचल उठा और वह जिद करने लगा तब गुरु द्रोण को अपना बचपन का दोस्त द्रुपद का स्मरण हुआ और वे उनके पास जाने लगे.

द्रुपद नरेश बन चुके थे तो उनमे अहंकार की भावना आ गयी थी| जब द्रोण ने द्रुपद से मिलकर कहा मै तुम्हारा बचपन का मित्र हूँ तुम मेरी मदद करो मुझे एक गाय दे दो तब द्रुपद ने उन्हें अपमानित करते हुए कहा की तुम्हे खुद अपने आपको मेरा मित्र बताते हुए लज्जा नही आ रही क्या और उन्हें अपमानित कर दिया.

गुरु द्रोण वहा से चुप चाप वापस चले गये और वे कृपाचार्य के घर में गुप्त से रहने लगे| एक दिन युधिष्ठिर और सभी राजकुमार से गेंद से खेल रहे थे और गेंद कुए में जाकर गिर गयी और वही से गुरु द्रोण जा रहे थे तब युधिष्ठिर बोले की आप हमारी गेंद निकाल दे तब गुरु द्रोण बोले अगर हम आपकी गेंद निकाल देंगे तो आप मेरे लिए भोजन देंगे ?

युधिष्ठिर बोले अगर हमारे पितामह की अनुमति हुई तो आप हमेशा के लिए भोजन पा सकेंगे| ये जानकर गुरु द्रोण ने गेंद निकाल दी और भीष्म ने राजकुमारों की शिक्षा के लिए गुरु द्रोण को वही रख लिया.

धृतराष्ट्र पाण्डु और विदुर का जन्म और उनके विवाह

महाभारत : सत्यवती के दो पुत्र हुए थे एक चित्रांगद और दूसरा विचित्रवीर्य|

जब ये दोनों राजकुमार छोटे ही थे तब इनके पिता राजा शांतनु की मृत्यु हुई थी इसीलिए राजकुमारों का पालन पोषण भीष्म ने किया|

जब कुमार चित्रांगद बड़े हुए तब भीष्म ने इनको राज गद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ काल बाद चित्रांगद मारा गया इसके बाद भीष्म ने विचित्रवीर्य को राज्य सोप दिया|

अब विचित्रवीर्य विवाह योग्य हो गये थे इसीलिए भीष्म ने उनके विवाह के बारे में विचार किया तथा उन दिनों की काशिराज की तीन पुत्रियों का स्वयंवर होने वाला था| इन तीनो के नाम अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका था|

उनके स्वयंवर में जाकर भीष्म ने सभी राजाओ को हराकर तीनो कन्याओं को अपने साथ ले आये तथा जब वे तीनो को अपने साथ अपने महल लाये तो राजकुमारी अम्बा बोली की वो राजा शाल्व को पसंद करती है तब भीष्म ने अम्बा को सम्मान के साथ राजा शाल्व के पास भेज दिया लेकिन राजा शाल्व ने उन्हें अब स्वीकार नही किया|

अब अम्बा वापस हस्तिनापुर आ गयी और उन्होंने भीष्म से बोला की महाराज उन्होंने मुझे स्वीकार नही किया है कृप्या अब आप मुझसे विवाह करे किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण अम्बा को स्वीकार नही किया जिससे की अम्बा स्वम् का अपमान सहकर वहा से चली गयी.

राजा विचित्रवीर्य अपनी दोनों पत्नियों के साथ भोग विलास मे लीन थे और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी और उनकी दोनों ही रानियों से कोई सन्तान नही हुई थी.

अब कोई सन्तान न होने की वजह से माता सत्यवती को कुल के नाश होने का भय सताने लगा तो माता सत्यवती ने भीष्म को दोनों रानियों से पुत्र देने की आगया दी परन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा नही तोडी|

अब माता सत्यवती दुःख के साथ समय व्यतीत कर रही थी और अचानक उनको अपने पुत्र वेदव्यास का स्मरण आया|

जैसे ही माता ने वेदव्यास का स्मरण किया तभी उनके पुत्र वेदव्यास वहां उपस्थित हो गये और वो उनसे बोली “पुत्र तुम्हारे भाई बिना किसी सन्तान के स्वर्गवासी हो गये अब तुम ही इस वंश का नाश होने से बचा सकते हो मै तुम्हे आज्ञा देती हूँ की तुम इन पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो”

अब व्यास बोले की माता मै एक वर्ष बाद आऊंगा माता बोली की एक वर्ष का समय ही है पुत्र तब वेदव्यास जी ने अम्बिका को बुलाया और अम्बिका उनको देख कर डर गयी और उसने आखे बंद कर ली जिससे की निष्कर्ष यह निकला की वेदव्यास ने माता सत्यवती को बताया की माता अम्बिका का पुत्र होगा तो बड़ा तेजवान लेकिन वह आख से नेत्रहीन होगा|

माता सत्यवती को यह जानकर बड़ा दुःख हुआ और फिर वेदव्यास जी अम्बालिका को अपने पास बुलाये और अम्बालिका उन्हें देख कर भय से पिली पड गयी और इसका निष्कर्ष यह निकला की उसका पुत्र रोग से ग्रसित रहेगा|

अब माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ और माता सत्यवती ने अम्बालिका को पुनह वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया लेकिन अम्बालिका ने खुद न जाकर दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया और दासी के गर्भ से अत्यंत तेजवान पुत्र उत्पन्न होगा इतना कह कर वेदव्यास फिर से तपस्या करने चले गये.

समय आने पर अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु और और दासी के गर्भ से विदुर हुए.

पाण्डु का राज्याभिषेक – महाभारत कथा हिंदी में भाग 1

धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे होने के कारण उनकी जगह पाण्डु को राजा बनाया गया इसी वजह से ध्रिष्ट्र को अपने नेत्रहीन होने पर सदेव खुद और क्रोध आता था.

अब उन्हें पाण्डु से द्वेष भावना भी होने लगी थी| पाण्डु समस्त भारतवर्ष को जीत कर कुरु राज्य सीमाओं का यवनों के देश तक विस्तार कर दिया था.

एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ शिकार करने वन में गये वहा उनको मर्ग का जोड़ा दिखाई दिया और पाण्डु ने तुरंत ही उस मर्ग को अपने बानो से घायल कर दिया|

मरते हुए उस निर्दोष मर्ग ने पाण्डु को श्राप दे दिया की तुम्हारे समान और कोई इस संसार में क्रूर नही होगा| तूने मुझे प्रणय के समय मारा जब भी कभी तू प्रणयरत होगा तो तेरी भी मृत्यु हो जाएगी.

अब इस शाप से पाण्डु बहुत दुखी हो गया और वह अपनी रानियों से बोला की आप दोनों वापस महल चली जाइए मै अपना जीवन यही व्यतीत करूंगा तो उनकी पत्नियाँ बोली की “हे महाराज हम आपके बिना नही रह सकती हम यही आपके साथ ही रहेंगी”.

पाण्डु ने अपनी दोनो रानियों को अपने साथ वन में ही रख लिया तथा पाण्डु ने उसी दोरान कुछ ऋषि मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शन के लिए जाते हुए देखा| उन्होंने आग्रह किया की मुझे भी अपने साथ ले चले.

निसंतान पुरुष ब्रह्मलोक जा नही सकता| यह बात सुनकर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले कुंती मेरा जन्म लेना ही व्यर्थ है क्यूंकि संतानहीन व्यक्ति पितृ ऋण, देव ऋण और मनुष्य ऋण से मुक्ति नही पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिए मेरी सहयता कर सकती हो ?

पाण्डु की पत्नी कुंती पाण्डु से बोलती है की “हे आर्य, ऋषि दुर्वासा ने मुझे ऐसा मन्त्र दिया है जिसे जपकर मै किसी भी देवता को बुला सकती हूँ और मनचाहा फल मांग सकती हूँ”.

कुंती बोली आप आज्ञा दे मै किस देव को बुलाऊ ?

पांडू ने कुंती को धर्म को बुलाने का आदेश दिया

धर्म ने कुंती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया| कालान्तर में पाण्डु ने कुंती को पुन: दो बार वायुदेव और इन्द्रदेव को बुलाने की आज्ञा दी|

वायुदेव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन की उत्पत्ति हुई इसके बाद पाण्डु की आज्ञा से कुंती ने माद्री को भी इस मन्त्र की शिक्षा दी|

माद्री ने अश्वनी कुमारो को जन्म दिया और उनसे नकुल और सहदेव की उत्पत्ति हुई|

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे और उसी समय माद्री का वस्त्र हवा के झोके के कारण उड़ गया पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे प्रणय में परवर्त हुए ही थे तभी उनकी मृत्यु हो गयी| माद्री भी उनके साथ सती हो गयी.

कुंती सभी बालको को लेकर हस्तिनापुर लोट आई और ऋषि मुनि पांडवों को राजमहल छोडकर आगये| कुंती ने जब सबको बताया की ये पाण्डु पुत्र है तो सभी ने पाण्डु पुत्रों का स्वागत किया.

कर्ण का जन्म कैसे हुआ महाभारत में – Mahabharata Karna Story in Hindi

भीष्म पर धृतराष्ट्र ,पाण्डु और विदुर तीनो के लालन पालन का भार था| तीनो पुत्र बड़े होने के बाद विद्या के लिए भेजे गये धृतराष्ट्र बल विद्या में पाण्डु धनुर्विद्या में और विदुर धर्म और निति में निपुण हुए.

अंधे होने की वजह से धृतराष्ट्र को उतराधिकारी का पद नही मिला| विदुर तो दासी पुत्र थे इसीलिए पाण्डु को ही हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया.

भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से करा दिया| जब गांधारी को ज्ञात हुआ की उनका पती अँधा है तो उसने भी अपनी आखो पर पट्टी बाध ली|

राजा शूरसेन की पुत्री को की बाद में पाण्डु की पत्नी बनने वाली थी जब वह कुवारी थी| उनके यहा ऋषि दुर्वासा का आगमन हुआ और कुंती ने दिल लगाकर ऋषि दुर्वासा की सेवा की और कुंती की इस बात से ऋषि दुर्वासा बहुत अधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने कुंती को एक ऐसा मन्त्र दिया जिसका जप करके वह किसी भी देवता को बुला सकती थी.

ऋषि दुर्वासा तो मन्त्र का ज्ञान देकर चले गये और कुंती पीछे से परेशान थी की वह केसे जाने की यह मन्त्र कार्य करता है या नही तब वह एकांत में बेठ कर उस मन्त्र का जाप करने लगी और उसने सूर्य देव का आवाहन किया तभी सूर्य देव वहा प्रकट हो गये और बोले की देवी मुझे बताओ की तुम्हे किस वस्तु की अभिलाषा है में तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा|

कुंती बोली देव मुझे आपसे कुछ नही चाइये मै तो केवल मन्त्र की सत्यता परखने के लिए आपका आवाहन कर रही थी| कुंती की यह बात जानकर सूर्यदेव बोले की मेरा आना वर्थ नही जा सकता मै तुमको अत्यंत प्रकर्मी और दानशील पुत्र प्रदान करता हूँ इतना कह कर सूर्यदेव वहा से चले गये.

कुंती को लगा की अभी तो वह विवाहित भी नही है कही कोई उसके चरित्र पर ना दाग लगा दे| समय आने पर कुंती के गर्भ से कवच कुण्डल धारण किये हुए पुत्र पैदा हुआ|

कुंती ने उस बालक को रात्रि में गंगा में बहा दिया| वह बहता हुआ बालक वहा पहुचा जहा धृतराष्ट्र का सारथि अधिरथ अपने अश्व को गंगा नदी में जल पिला रहा था उसकी दृष्टि कवचकुण्डल धारी पुत्र पर पड़ी.

अधिरथ की कोई संतान नही थी उसने बालक को उठाकर सिने से लगा लिया और घर लेजाकर अपने पुत्र की तरह पालने लगा उस बालक के कान बहुत अधिक सुंदर थे इसीलिए उसका नाम कर्ण (सूर्यपुत्र कर्ण) रखा गया.

कर्ण की रूचि युद्धकला में अधिक थी कर्ण और उसके पिता अदीरथ आचार्य द्रोण से मिले जो की युद्धकला में सर्वश्रेष्ट थे|

द्रोणाचार्य सिर्फ स्त्रियों को ही शिक्षा देते थे और कर्ण सारथि पुत्र था इसके बाद कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो की केवल ब्राह्मण को ही शिक्षा देते थे तो कर्ण ने खुदको ब्राह्मण बताकर शिक्षा का आग्रह किया और परशुराम ने कर्ण को अपने ही समान शिक्षा धनु विधियाँ में निपुण किया.

एक बार दोपहर के समय परशुराम कर्ण की जंघा पर सर रखकर सों रहे थे| कर्ण की जांघ पर बिच्छू काट गया| कर्ण की जांघ से बहुत रक्त बह रहा था जब परशुराम जी की निद्रा टूटी तो उन्होंने कहा की इतनी सहनशीलता तो एक शात्रीय में ही हो सकती है तब उन्होंने कर्ण को श्राप दिया की जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की जरूरत पड़ेगी उस दिन वह उसके काम नही आएगी.

कर्ण नही जानता था की वह किस वंश से है उसने गुरु परशुराम से कहा की उसकी जगह कोई भी शिष्य होता वह यही करता उसके बाद परशुराम को अपने क्रोधवश शाप देने के बाद ग्लानी हुई तब उन्होंने कर्ण को अपना विजय नामक धनुष दिया और उसे आशीर्वाद दिया.

इसके बाद कुछ समय तक कर्ण भटकता रहा फिर वह शब्दभेदी विद्या सिख रहा था| अभ्यास के बाद उसने एक गाय के बछड़े को वनीय पशु समझ कर उस पर बाण चला दिया और बछडा मारा गया तब उस गाय के स्वामी ने गुस्से में आकर कर्ण को श्राप दे दिया की जिस तरह तुमने एक असहाय जिव को मारा है ठीक इसी तरह तुमारी भी मृत्यु हो जाएगी फिर कर्ण दुर्योधन के आश्रय में रहने लगा.

गुरु द्रोण ने अपने शिष्यों की शिक्षा पूरी होने के बाद एक रंगभूमि का आयोजन करवाया| रंगभूमी में अपने अलग अलग करतबों से एक बेहतरीन योधा साबित हुआ| तब कृपाचार्य ने कर्ण को इस मुकाबले में हिस्सा लेने से मना कर दिया और अर्जुन हस्तिनापुर का राजकुमार था इसीलिए वह मुकाबले में हिस्सा ले सकता था.

कृपाचार्य ने कर्ण से उसके वंश और साम्राज्य के बारे में पूछा तब कौरवों में सबसे ज्येष्ठ दुर्योधन ने कर्ण को अंगराज घोषित कर दिया जिसके कारण अब कर्ण अर्जुन से युद्ध करने के लिए योग्य हो गये थे.

अब इसके बाद कर्ण और दुर्योधन के बिच अच्छी दोस्ती हो गयी| कर्ण शकुनि मामा को बिलकुल भी पसंद नही करता था| कर्ण को पता नही था की वह सूर्य पुत्र और कुंती का पुत्र है इसलिए वह दुर्योधन के साथ दोस्ती निभा कर पांडवों को मारने के प्रयास में मदत कर रहा था.

जब दुर्योधन का पांडवों को मारने का प्रयास असफल हो रहा तो कर्ण ने दुर्योधन को समझाया.

एकलव्य की भक्ति – एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य की कहानी हिंदी में

एकलव्य धनु नामक निषाद का पुत्र था एकलव्य को उसकी सीखी हुई धनुर्विद्या और गुरु भक्ति के लिए जाना जाता है| अपने पिता की मृत्यु के बाद वह श्रंग्बेर राज्य का शाषक बना|

कथा के अनुसार एकलव्य धनुर्विद्या सिखने के लिए गुरु द्रोण के पास गये| गुरु द्रोण ने एकलव्य को अपना शिष्य स्वीकार नही किया और इसके बाद एकलव्य वन में चला गया|

उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ती बनाई और उस मूर्ती को ही गुरु मानकर वो अभ्यास करने लगा| एक दिन पांडव और कोरव राजकुमार वन में शिकार करने के लिए गये और उनका कुत्ता वन में भटक गया और वह एकलव्य के आश्रम में पहुच गया और वह एकलव्य को देखकर भोकने लगा|

कुत्ते के भोकने से एकलव्य की साधना में बाधा आ रही थी और एकलव्य ने अपने बानो से कुत्ते का मुह बंद कर दिया| एकलव्य ने इस प्रकार बाण चलाये थे की कुत्ते को किसी भी प्रकार की चोट नही लगी.

कुत्ते के वापस लोटने पर पांडव, कोरव और खुद गुरु द्रोण भी हेरान हो गये थे| गुरु द्रोण एकलव्य की खोज करते हुए वन में जा पहुचे| जब उन्होंने देखा की एकलव्य ने उनकी मूर्ति को ही गुरु मानकर खुद से ही विद्या सीखी है तब गुरु द्रोण ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांग लिया था|

तभी एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर दे दिया था| इसके बाद भी एकलव्य तीर चलाना से नही रुका वह माध्यम ऊँगली और तर्जनी ऊँगली से तीर चलाने लगा और यही से तीर चलाने के नये अंदाज ने जन्म लिया| आज जो आधुनिक तरीका प्रयोग में लाया जाता है वह तरीका एकलव्य से शुरू हुआ था.

लाक्षागृह षड्यंत्र महाभारत | लाक्षागृह की कहानी | Mahabharat Katha in Hindi Part 1

दुर्योधन और शकुनि ने पन्द्वोप के वर में ऐसा कार्य किया जिससे की उनमे जंग की आग प्रज्वलित हो उठी| शकुनि के कहने पर कई बार बचपन में दुर्योधन ने पांडवों को मारने की कोशिश की|

युवा अवस्था में आके युधिष्ठिर सबसे अधिक गुणवान था इसीलिए उसे युवराज बना दिया गया| तब शकुनि ने लाक्ष के बने हुए धृ में पांडवों को भेजकर उन्हे मारने का प्रयास किया किन्तु विदुर की सहायता से पांचो पांडव और उनकी माता उस घर से बाहर सही सलामत वापस आ गई.

युधिष्ठिर बहुत गुणवान था इसीलिए भीष्म ने युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा घोषित करने को कहा लेकिन दुर्योधन यह नही चाहता था इसीलिए उसने अपने पिता से कहा की पिता जी अगर युधिष्ठिर राजा बन गया तो राजसिंहासन युधिष्ठिर के हाथ लग जाएगा और हमेशा के लिए सिंहासन पर पांडवों का अधिकार हो जाएगा और हम कौरवों को हमेशा पांडवों का सेवक बन कर रहना पड़ेगा|

तब धृतराष्ट्र बोले की वत्स युधिष्ठिर हमारे कुल में सबसे बड़ा है इसीलिए सिहासन पर उसका अधिकार है और फिर भीष्म पितामह और राज्य के लोग भी उसी को राजा बनाना चाहते है इसीलिए हम इसमें कुछ नही कर सकते है|

तब दुर्योधन बोला की पिता जी मेने कुछ सोचा है और आप बस मेरी थोड़ी मदत कर दे तब दुर्योधन बोला की मेने वारणावत में एक घर बनवाया जो की लाख, सुखी गान्स, मुंज आदि ज्वलनशील प्रदार्थ से मिलकर बना है आप किसी तरह पांडवों को वारणावत भेज दे|

दुर्योधन ने ऐसा षड्यंत्र रचा था की वहा जाकर वह उन्हें जला कर मार देगा| दुर्योधन के इस षड्यंत्र का विदुर को पता चल गया और विदुर ने जब युधिष्ठिर वारणावत जा रहा था तब उसे सब समझा दिया की वह घर ज्वलनशील प्रदार्थ से मिलकर बना है जरा सी आग लगते ही वह पूरा घर जल कर राख हो जाएगा|

मै एक कारीगर भेजूंगा तुम उसके साथ मिलकर उस घर से वन में निकलने वाली एक सुरंग बना लेना और विदुर की सब बात समझ कर युधिष्ठिर ने उस घर में जाकर पूरी सावधानी से एक सुरंग तैयार करवाई और पांडव रोज ही शिकार के बहाने जाकर अपने रहने के लिए उचित स्थान की खोज करने लगे|

अब जब उन्हें उचित स्थान मिल गया तो पांडवों ने सोचा इस घर से निकलना अब ठीक रहेगा उन्होंने उस रात्री को पुरोचन को किसी तरह बहाने से बुलवाया और उसे बंदी बनाकर कमरे में बंद कर दिया और पुरे भवन में आग लगा दी.

जब हस्तिनापुर यह समाचार पहुचा की वारणावत का पूरा घर जल कर राख हो गया है तब दुर्योधन को बहुत ख़ुशी हुई लेकिन उसने सबके सामने पांडवों के मरने का शोक मनाया.

महाभारत में द्रौपदी का स्वयंवर स्टोरी इन हिंदी – Mahabharat Draupadi Swayamvar in Hindi

द्रौपदी के स्वयंवर में सभी बड़े बड़े राजा महाराजा पधारे हुए थे| एक और भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम ठाठ गणमान्य यदुवंशी के साथ में विराजमान थे|

कुछ ही देर बाद हाथ में वरमाला लिए हुए द्रौपदी अपने भाई के साथ सभा में आई, द्रौपदी के भाई ने सभा में आये हुए सभी देशो के राजाओं को कहा की आप सब को उपर स्तंभ पर मछली के प्रतिबिम्ब को देखकर मछली की आख में तीर मारकर अपने आप को प्रस्तुत करना है जो यह कार्य करने में सफल होगा उसी से मेरी बहन द्रौपदी का विवाह होगा.

सभी राजाओ ने मछली की आँख में तीर मारने का प्रयास किया लेकिन एक के बाद एक सभी असफल होते जा रहे थे|

सभा में कर्ण भी थे जेसे ही कर्ण ने धनुष उठाया तभी द्रौपदी बोली की यह सूतपुत्र है मै इसका चुनाव नही कर सकती तब अर्जुन ने धनुष उठाया लेकिन अर्जुन ब्राह्मण था और ब्राह्मण को वहा स्वयंवर में देखकर सब अचंबित थे|

लेकिन ब्राह्मण को शात्रीय से उच्च माना जाता है इसीलिए कोई कुछ नही बोला और अर्जुन ने एक ही बारी में मछली की आख में तीर मार दिया और द्रौपदी ने अर्जुन के गले में माला डाल दी तब वहा बेठे सभी राजा इस बात से क्रोधित हो गये की अर्जुन तो ब्राह्मण है और सब अर्जुन पर हमला बोल पड़े.

पांडवों ने अर्जुन की रक्षा करने में उसकी सहयता की और दुर्योधन भी यह जान चुका था की तीर भेदने वाला अर्जुन ही होगा और उसका साथ देने वाले पांडव|

श्री कृष्ण भी अर्जुन को पहचान गये थे दुर्योधन तो बहुत आश्चर्य था की पांडव वारणावत के लाख के घर से बच केसे निकले| पांडव द्रौपदी को साथ लेकर वहा गये जहा वे अपनी माँ कुंती के साथ रह कर समय व्यतीत कर रहे थे.

अर्जुन से द्वार से ही माँ को पुकार लगाई और कहा माता देखिये हम क्या लाये है| माता ने अंदर से ही बोल दिया की जो भी लाये हो आपस में बाट लो|

जब बाद में कुंती को पता चला की उसके यहा वधु आई है उन्हें बहुत पश्ताप हुआ किन्तु माता के वचनों को सत्य करने के लिए द्रौपदी ने पांचो को अपना पती स्वीकार कर लिया उसके कुछ समय पश्चात् वहा श्रीकृष्ण भी आ पहुचे और उन्होंने अपनी बुआ कुंती के चरण स्पर्श किये और आशीर्वाद लिया| अपने भाई पांडवों के गले मिले.

श्री कृष्ण सभी से मिलकर द्वारका नगरी चले गये| द्रौपदी के स्वयंवर में द्रुपद और धृष्टद्युम्न को शक हो गया था की ब्राह्मण के वेश में ये पांडव ही है इसीलिए द्रुपद ने धृष्टद्युम्न के द्वारा ब्राह्मणों को राजप्रसाद के लिए बुलवाया|

उन्होंने पांडवों को पहले तो राजकोष दिखाया लेकिन पांडवों ने हीरे मोती देखकर किसी प्रकार की कोई रूचि नही दिखाई इसके बाद उन्हें शस्त्र ग्रह दिखाया शस्त्र ग्रह में उन्होंने पूरी रूचि दिखाई तब द्रुपद समझ गया की ये कोई योधा ही है|

द्रुपद ने पांडवों को कहा हे आर्य आप ब्राह्मण तो नही है कृप्या आप मुझे आपना सही परिचय दीजिये तब युधिष्ठिर बोले की हम पाण्डु पुत्र पांडव है तब द्रुपद को यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई वो बोले की मै चाहता था की मेरी पुत्री का विवाह पांडू पुत्र अर्जुन से हो तब युधिष्ठिर बोले की महाराज, द्रोपती का विवाह तो हम पांचो भाइयो से होना है| यह सुनकर द्रुपद आश्चर्यचकित हुए|

एक स्त्री अनेक पती ऐसा पहली बार हो रहा है तभी सभा में वेदव्यास जी आये और उन्होंने बताया की पिछले जन्म में द्रोपती ने भगवान शिव की भक्ति की थी जिसके फल स्वरूप द्रोपती को पांच प्रक्रम पती मिलने थे|

वेदव्यास जी के वचनों को सुनकर द्रुपद का संदेह दूर हो गया….

प्रिय पाठकों, यह महाभारत का आधा भाग है| आपको महाभारत का बाकी अधूरा भाग आपको नीचे दिए गये लिंक पर क्लिक करके मिलेगा.

यहा हमने महाभारत कथा बहुत ही सरल शब्दों में लिखी गयी है आप आसानी से समझ सकेंगे और अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे शेयर जरूर करे और साथ में कमेंट करना बिलकुल ना भूले.

आईये, अंत में लेख समाप्त करने से पहले महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य के विषय में चर्चा कर लेते है| यह चर्चा आपकी जनरल नॉलेज को बढ़ाएगी.

प्रशन 1 : पांडु के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर : महाभारत के अनुसार पाण्डु अम्बालिका और ऋषि व्यास के पुत्र थे |

प्रशन 2 : कुन्ती के कितने पुत्र थे ?
उत्तर : कुंती के 4 पुत्र थे| कर्ण, युधिष्ठर, भीम और अर्जुन

प्रशन 3 : कुंती के सबसे बड़े पुत्र का नाम क्या था ?
उत्तर : सूर्यपुत्र महारथी कर्ण

प्रशन 4 : महाभारत में कुंती किसकी पुत्री थी ?
उत्तर : (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी थी|

प्रशन 5 : अर्जुन के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर : महाराज पाण्डु

प्रशन 6 : विदुर की माता का क्या नाम था ?
उत्तर : दासी पुत्र (इनकी माता का नाम उपलब्ध नही है)

प्रशन 7 : महाभारत में धृतराष्ट्र के कितने पुत्र थे ?
उत्तर : सौ पुत्र और एक पुत्री

प्रशन 8 : धृतराष्ट्र की पुत्री का नाम क्या है ?
उत्तर : दुःशला

प्रशन 9 : महाभारत में धृतराष्ट्र के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर : विचित्रवीर्य |

प्रशन 10 : शकुनि की बहन का नाम क्या है ?
उत्तर : गांधारी

प्रशन 11 : भीष्म की माता का क्या नाम था ?
उत्तर : गंगा

प्रशन 12 : भीष्म के पिता का नाम क्या था
उत्तर : शांतनु

प्रशन 13 : भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान किसने दिया था ?
उत्तर : उनके पिता शांतनु ने

प्रशन 14 : भीष्म पितामह का असली नाम क्या था ?
उत्तर : देवव्रत

प्रशन 15 : राजा पांडु की कितनी पत्नियां थीं ?
उत्तर : राजा पाण्डु की दो पत्नियाँ थी | कुन्ती और माद्री

भारत का इतिहास ⇓

Mahabharat Katha Part 2 – महाभारत कथा भाग २

Full Mahabharat Katha in Hindi

Mahabharat Katha : महाभारत कथा का यह दूसरा भाग है| अगर आपने पहला भाग नही पड़ा है तो सबसे पहले आप महाभारत की कहानी का भाग 1 पढ़े उसके बाद इस भाग को पढ़े तभी आपको सम्पूर्ण महाभारत की कथा समझ आएगी.

महाभारत कथा के भाग 1 में हमने कुछ विषय पर चर्चा की थी जो इस प्रकार है:-

  1. कुरु वंश की उत्पत्ति
  2. कृपाचार्य और द्रोणाचार्य
  3. धृतराष्ट्र पाण्डु और विदुर का जन्म और उनके विवाह
  4. पाण्डु का राज्याभिषेक
  5. कर्ण का जन्म कैसे हुआ
  6. एकलव्य की भक्ति
  7. लाक्षागृह षड्यंत्र महाभारत
  8. द्रौपदी का स्वयंवर

इस भाग में हम इन्द्रप्रस्थ की स्थापना, पांडवों की विश्वविजय, दिव्यास्त्रों की प्राप्ति, जयद्रथ की दुर्गति और कीचक वध के विषय में चर्चा करेंगे| तो आईये महाभारत कथा के इस लेख को पढ़ना शुरू करते है.

महाभारत इंद्रप्रस्थ का निर्माण – Mahabharat Katha

अब तक सभी को लगता था की पांडव मर गये है लेकिन स्वयम्वर के बाद सबको शक हो गया था की पांडव जीवित है| पांडव को मृत समझने के कारण ही शकुनी के कहने पर धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को युवराज बना दिया था.

द्रौपदी स्वयंवर के बाद सबको पता चला की पांडव जीवित है फिर पांडवों ने कौरवों से अपना राज्य माँगा| युधिष्ठिर ग्रह युद्ध नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने कौरवों के द्वारा दिए हुए सुझाव को ही स्वीकार कर लिया.

पांडवों का विवाह पांचाली यानि की द्रुपद की पुत्री से होने की वजह से पांडव काफी शक्तिशाली हो गये इसके बाद धृतराष्ट्र ने पांडवों को अपने राज्य बुलवाया|

धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा की कुंती पुत्र आप सभी खाण्डवप्रस्थ के वन को हटाकर वहा एक सुंदर शहर का निर्माण करो जिससे की मेरे पुत्रो और तुम सभी में कोई भी फर्क ना हो|

धृतराष्ट्र की यह बात सुनकर पाण्डु पुत्रों ने हस्तिनापुर से प्रस्थान कर दिया| पांडवों ने खाण्डवप्रस्थ के वनों  को हटाकर वहा निर्माण कार्य शुरू कर दिया इसके बाद पांडवों ने श्री कृष्ण के साथ मिलकर तथा मय दानव के साथ पुरे शहर का सौंदर्यीकरण किया|

वह शहर इतना भव्य और सुंदर बना की वह दिखने में द्रितीय स्वर्ग के समान लगने लगा इसके बाद उस राज्य में एक यज्ञ और ग्रह प्रवेश अनुष्ठान हुआ|

इस राज्य में असंख्य द्वार थे जो की गरुड़ के विशाल फ़ले पंखो की तरह खुले थे| इस शहर की रक्षा दिवार में मद्रांचल पर्वत जैसे विशाल द्वार थे| इस शस्त्रों से सुसज्जित नगरी को किसी भी दुश्मन का बाण खरोंच भी नही दे सकता था यहा तोपे बड़ी और शतघ्नी थी जैसे की दुमही सांप होते है|

इस नगर की बुर्जियो पर सशस्त्र सेना के सेनिक लगे थे| उनकी दीवारों पर वृहद लौह चक्र भी लगे थे इस राज्य की सड़के बहुत चोडी और बड़ी थी और साफ़ सुथरी थी|

इन सडको पर कोई दुर्घटना का डर भी नही था यह नगरी इंद्र की अमरावती नगरी के समान दिखने लगी थी| इसी वजह से इस नगर का नाम इन्द्रप्रस्थ रखा गया.

इस नगर के सबसे श्रेठ भाग में पांडवों का महल था जिसमे कुबेर के समान खजाना और भण्डार थे| इतना वैभव को देखकर आखे चोंधिया जाती थी|

जब यह शहर बसा तो वहा बड़ी संख्या में ब्राह्मण आये और उनके पास वेद शास्त्र भी थे यहा अलग अलग दिशाओ से व्यापारी गण आये हुए थे क्यूंकि उन्हें यहा नया व्यापार करने और धन कमाने की आशा थी.

बहुत सारे कारीगर वर्ग के लोग भी यहा आये| इस शहर के भारी हिस्से में कई उद्यान थे जहा अलग अलग प्रकार के बहुत सारे फल फुल लगे हुए थे.

पांडवों की विश्वविजय – Mahabharat Katha in Hindi

धृतराष्ट्र ने विदुर को इन्द्रप्रस्थ जाकर युधिष्ठिर को आमंत्रित करने को कहा लेकिन विदुर जाने का विरोध कर रहा था परन्तु उसे धृतराष्ट्र की बात माननी ही पड़ी और विदुर को इन्द्रप्रस्थ जाना पड़ा.

धृतराष्ट्र ने विदुर से कह कर भेजा था की वह युधिष्ठिर को उनकी किसी भी योजना के बारे में कुछ ना बताये विदुर इन्द्रप्रस्थ जाकर युधिष्ठिर को आमंत्रित कर आया|

पांडवों के हस्तिनापुर आने के बाद विदुर ने एकांत में जाकर सारी योजना के बारे में पांडवों को बता दिया युधिष्ठिर ने भी चुनोती स्वीकार करली|

पांडव कौरवों से समस्त दावो में हार गये और आखरी में वे द्रोपदी को भी हार गये| विदुर ने कहा की अपने आप को दाव पर हारने के बाद युधिष्ठिर द्रोपदी को दाव पर लगाने का अधिकारी नही है परन्तु धृतराष्ट्र ने द्रोपदी को एक सेवक प्रतिकामी के हाथ दरबार में बुलवा लिया|

द्रोपदी ने वहा आने से पहले यही प्रश्न किया की धर्मपुत्र ने कोनसा दाव हारा है मेरा या उनका ?

दुर्योधन ने अब भाई से कहा की द्रोपदी को सभा में बुलवाओ| युधिष्ठिर ने एक सेवक से कहा की द्रोपदी से कहो की यदि वह रजस्वला है या फिर एक वस्त्र में है तो वह वेसी ही उठ कर चली आये सभा में|

पुज्यवर्ग के सामने उसका उस दशा में कल्पते हुए पहुचना दुर्योधन आदि के पापो को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त होगा|

जब द्रोपदी सभा में आई तो दुशासन से उसे स्त्रियों की और नही जाने दिया और उसके बाल पकड़ कर खीच लिए और कहा की:-

“हमने तुझे जुए में जीता है अत हम तुझे अपनी दासियों में रखेंगे”

द्रोपदी ने समस्त कुरुवंशियो के शोर्य, धर्म और नीति को ललकारा और श्रीकृष्ण को मन ही मन स्मरण कर अपनी लाज बचाने के लिए प्राथना करती रही|

सब चुप थे परन्तु दुर्योधन का छोटा भाई विकर्ण बोला की हारा हुआ युधिष्ठिर द्रोपदी को दाव पर नही रख सकता था किन्तु किसी ने भी उसकी  बात नही सुनी|

कर्ण के उकसाने से दुशासन ने द्रोपदी को निर्वस्त्र करने की चेष्टा की उधर रोती हुई द्रोपदी ने जब पांडवों की और देखा तो भीम ने युधिष्ठिर से कहा की वह उसके हाथ जला देना चाहता है जिनसे उसने जुआ खेला था|

अर्जुन ने उसे शांत किया और भीम ने शपथ ली की वह दुशासन की छाती का खून पिएगा और दुर्योधन की जांघ को अपनी गदा से नष्ट कर  डालेगा|

द्रोपदी श्री कृष्ण का स्मरण कर रही थी| जब दुशासन द्रोपदी के वस्त्र को उतार रहा था तब श्रीकृष्ण की कृपा से उसके तन पर इतने वस्त्र आ गये की दुशासन खिचता रहा और द्रोपदी के शरीर पर कपड़े तने ही रहे|

दुर्योधन ने पांडवों को मोन देख कर द्रोपदी की दाव में हारे जाने की बात ठीक थी या नही इसका निर्णय भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव पर छोड़ दिया|

अर्जुन तथा भीम ने कहा की जो व्यक्ति दाव में हार चूका हो वह किसी ऐसी वस्तु को दाव में रख ही नही सकता | धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को फटकारा और द्रोपदी से तीन वर मांगने को कहा|

  1. द्रोपदी ने पहले वर में युधिष्ठिर की मुक्ति मांगी|
  2. दुसरे वर में भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव की मुक्ति शस्त्र रहित मांगी|
  3. तीसरा वर मांगने को वह तैयार नही हुई क्युकी उसके अनुसार क्षत्रिय स्त्री दो ही वर मांगने की अधिकारी होती है|

धृतराष्ट्र ने उन्हें अब इन्द्रप्रस्थ जाने को कहा लेकिन दुर्योधन के कहने पर धृतराष्ट्र ने फिर से उन्हें जुआ खेलने की अनुमति दी|

इस बार दाव एक ही था| अबकी बार पांडवों और कौरवों में जो भी हारने वाला था वह बारह वर्ष का वनवास भोगेगा और एक वर्ष का अज्ञातवास में भी रहना है यदि इस बिच उन्हें कोई पहचान ले तो फिर से उन्हें बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ेगा.

भीष्म के रोकने पर भी सब जुआ खेलने को तैयार हो गये| इस बार फिर से पांडव हार गये और छली शकुनि जीत गया| वन गमन से पूर्व पांडवों ने शपथ ली की वे अपने सारे दुश्मनों को खत्म कर देंगे|

श्रीधोय्म्य पुरोहित के नेतृत्व में पांडवों ने द्रौपदी को साथ लेकर वन की और प्रस्थान किया| पुरोहित जी साम मंत्रो का गान करते हुए आगे की और बढ़े| पांडव कहकर गये थे की युद्ध में कौरवों के मरने पे उनके पुरोहित भी इसी प्रकार साम गान करेंगे|

युधिष्ठिर ने अपना मुह ढक रखा था| भीम अपने बाहूबल को स्मरण कर रहा था, अर्जुन रेत को बीखेरता हुआ जा रहा था, सहदेव ने अपने मुह  पर मिट्टी मिली हुई थी, द्रौपदी के बाल खुले हुए थे और अपने खुले बालो से मुह ढक कर विलाप कर रही थी|

वह सोच रही थी की जिस अन्याय से उसकी यह दशा हुई है चोदह वर्ष बाद शत्रुओं की नारियो की भी यही दशा होगी|

वनवास के बारह वर्ष पुरे हो गये और अब युधिष्ठिर ने योजना बनाई की वह वेश बदल कर मत्स्य देश की और चलेंगे| मार्ग में एक भयानक वन में भीतर के एक श्मशान में उन्होंने अपने अस्त्रों शस्त्रों को छुपाकर रख दिया और उसके उपर मरे हुए लोगो की हड्डियों और अस्थियो को रख दिया जिससे की भय के कारण कोई भी वहा ना आये.

पांडवों ने अपने नकली नाम रखे जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्वल ये नाम सिर्फ मार्ग के लिए थे| मत्स्य देश जाकर वह अपने दुसरे नाम रखने वाले थे|

जब पांडव राजा विराट के दरबार में पहुचे तो युधिष्ठिर बोले की राजन में व्याघ्रपद गोत्र में पैदा हुआ हूँ मेरा नाम कंक और मै घुत विद्या में निपुण हूँ आपके पास आपकी सेवा करने की कामना लेकर आया हूँ|

राजा विराट बोले की आप दर्शनीय पुरुष नजर आते है मै आपसे प्रसन्न हूँ आप सम्मान पूर्वक यहा रह सकते है उसके बाद सभी पांडव राजा विराट के दरबार में आये और बोले की राजन हम सब पहले राजा युधिष्ठिर के सेवक थे पांडवों को वनवास हुआ है इसीलिए हम आपकी सेवा के लिए उपस्थित हुए है.

राजा विराट ने सबसे उनका परिचय पूछा तब सबसे पहले हाथ में कढाई और करछुल लिए हुए भीमसेन बोले की मेरा नाम बल्लभ है में रसोई बनाने के कार्य में निपुण हूँ|

सहदेव बोले की मेरा नाम तंतिपाल है मै गाय और बछड़ो की नस्ल पहचानने में निपुण हूँ|

नकुल बोले मेरा नाम ग्रंथिक है मै अश्व विद्या में निपुण हूँ|

महाराज विराट ने सभी को अपनी सेवा में रख लिया आखरी में अर्जुन आते है और कहते है की में नृत्य में निपुण हूँ और बताया की वो नपुंसक है|

व्रहनला ने उनके नपुंसक होने की जांच कराइ और फिर राजा विराट ने अपनी पुत्री की संगीत शिक्षा के लिए उन्हें रख लिया|

इधर द्रौपदी आई और महाराज विराट के पास जाकर बोली की महारानी मै पहले महारानी द्रौपदी की दासी थी मेरा नाम सैरन्ध्री है अब मै आपकी सेवा का कार्य करने की कामना लेकर आई हूँ| महारानी ने भी द्रौपदी को अपनी दासी के रूप में रख लिया और यहा से द्रौपदी और पांडवों का अज्ञातवास शुरू हो गया.

दिव्यास्त्रों की प्राप्ति – सम्पूर्ण महाभारत की कथा हिंदी में

एक बार अर्जुन उतराखंड के पर्वतों को पार करते हुए एक सुंदर वन में जा पहुचे वहा के शांत वातावरण में भगवान् शिव जी की तपस्या करने लगे| अर्जुन की तपस्या की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव एक भील का वेश धारण कर उस वन में आये|

भील के रूप में शिव जी ने देखा की एक दैत्यशुक्र का रूप धारण कर अर्जुन की घात लगाये हुए है| भगवान शिव जी ने उस देत्य पर अपना बाण छोड़ दिया| शुक्र के बाण लगते ही उसके प्राण निकल गये|

शुक्र के मर जाने पर अर्जुन और भील रूपी शिव जी दोनों ही शुक्र को अपने अपने बाणों से मारा जाने का दावा करने लगे| दोनों के मध्य घोर विवाद हुआ और विवाद युद्ध का रूप धारण करने लगा|

अर्जुन भील पर लगातार बाणों की वर्षा करते रहे लेकिन भील मुस्कुराता रहा सारे बाण उसके शरीर से टकराकर गिरते रहे अंत में अर्जुन की तरकश के सभी बाण समाप्त हो गये|

अब अर्जुन क्रोधित होकर भील से मल्ल युद्ध करने लगे जिसमे वे भील के प्रहार से मूर्छित हो गये थोड़ी देर बाद जब अर्जुन को होश आया उन्होंने देखा भील अभी भी वही खड़ा मुस्कुरा रहा था|

अर्जुन ने भील को मारने के लिए भगवान शिव की मूर्ति पर पुष्पमाला डाली परन्तु वह पुष्पमाला मूर्ति पर ना डल कर भील के गले में जा गिरी इसी बात से अर्जुन समझ गया की वह भील भगवान शिव ही है|

अर्जुन भगवान शिव जी के पेरो में गिर गया और माफ़ी मांगने लगा| भगवान शिव भी अपने असली रूप में आ गये और शिव जी अर्जुन से बोले की मै तुम्हारी इस भक्ति से प्रसन्न हूँ और तुमको में पाशुपतास्त्र देता हूँ इसके बाद शिव जी वहा से अंतर्ध्यान हो गये और इसके बाद वरुण, यम, कुबेर, इंद्र, गन्धर्व आदि सब अपने अपने वाहनों पर सवार होकर वहा आ गये|

अर्जुन ने सभी देवताओं की विधि विधान से पूजा की और तब यमराज बोले की अर्जुन आप नर के अवतार है और भगवान श्री कृष्ण नारायण के अवतार है आप दोनों मिलकर पृथ्वी का भार हल्का करोगे और सभी देवता कई अस्त्र शस्त्र अर्जुन को देकर वहा से चले गये|

इसके बाद अर्जुन को इंद्र देव कहकर गये की जब तक वे अपने सारथि को अर्जुन को ना लेने भेजे तब तक अर्जुन वही रहकर उनका इंतज़ार करे और कुछ समय बाद इंद्र देव का सारथि अर्जुन को लेने आये उसके साथ अर्जुन अमरावती नगर (इंद्र की नगरी) चले गये.

अर्जुन ने वहा जाकर इंद्र को प्रणाम किया| इंद्र देव ने अर्जुन को अपना आशीर्वाद दिया और अपने पास वाला आसन बेठने को दिया|

इंद्र की नगरी में रहकर अर्जुन ने अलोकिक अस्त्र शस्त्र का ज्ञान प्राप्त किया अर्जुन ने इस विषय में महारत प्राप्त कर ली फिर एक दिन अर्जुन से इंद्र देव ने कहा की वत्स तुम चित्र सेन नामक गंधर्व से नृत्य की शिक्षा प्राप्त करलो|

जब अर्जुन न्रत्य शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तब वहा इंद्र की अप्सरा उर्वशी आई और बोली की ‘हे अर्जुन आपको देखकर मेरी प्रणय जाग्रत हो गयी है अत: आप मेरे साथ विहार करके मेरी प्रणय को शांत कीजिये’.

तब अर्जुन बोले की देवी आपने हमारे पूर्वजो से विवाह कर हमारे वंश का गोरव बढ़ाया था आप मेरे लिए मेरी माता तुली है अर्जुन के इसी वचनों को सुनकर उर्वशी को अच्छा नही लगा और वह अर्जुन को एक वर्ष तक नपुंसक होने का शाप देकर चली गयी|

इसके बाद अर्जुन ने यह सारी बात इंद्र को बताई इंद्र ने अर्जुन से कहा की यह शाप भी तुम्हारे काम आएगा जब तुम अज्ञातवास को जाओगे तब यह शाप तुम्हे उपयोगी होगा यह शाप भी भगवान की ही इच्छा थी.

जयद्रथ की दुर्गति – जयद्रथ वध स्टोरी इन हिंदी – महाभारत पांडवों का 1 वर्ष का अज्ञातवास

एक बार पांडव किसी आवश्यक कार्य से आश्रम में केवल द्रोपदी और उनके साथ पुरोहित धौम्य थे उसी समय सिन्धु देश का राजा जयद्रथ जो विवाह की इच्छा से शाल्व देश जा रहा था वह आश्रम के बहार से निकला|

अचानक आश्रम के द्वार पर खड़ी द्रोपदी को जयद्रथ ने देखा और उस पर मुग्ध हो बेठा| जयद्रथ ने अपनी सेना को वही रोका और अपने मित्र कार्तिकस्य से कहा की जाकर पता करो की वह स्त्री कोन है यदि इस स्त्री से मेरा विवाह हो जाये तो मुझे शाल्व देश जाने की कोई जरूरत ही नही पड़ेगी.

कोतिकास्य द्रोपदी के पास जाकर बोला देवी आप कोन है ?

द्रोपदी बोली में पांडवों की पत्नी द्रोपदी हूँ मेरे पती अभी बहार गये है और आने वाले है इतने आप बहार बेठ जाइए और मै आपके खाने का प्रबंध करती हूँ|

यह सब बात जाकर कोतिकास्य ने जयद्रथ को बताई तब जयद्रथ द्रोपदी के पास जाकर बोला की आप क्यों आपना समय यहा वन में काट रही है आप मेरे साथ चलिए मै आपको रानी बनाकर रखूँगा|

तब यह बात सुनकर द्रोपदी बहुत क्रोधित हो गयी और और वह जयद्रथ को धिक्कारने लगी लेकिन जयद्रथ पर कोई भी असर नही पड़ा और वह द्रोपदी को पकडकर अपने रथ में बिठाने चला गया|

वहा उपस्थित पुरोहित जी ने द्रोपदी की रक्षा करने की सोची और द्रोपदी की सहायता के लिए वो रथ के पीछे भागे| तब जयद्रथ के सेनिको ने पुरोहित जी को भी आघात कर दिया और उन्हें पटक कर जमीन में दे मारा|

थोड़ी देर बाद वहा पांडव आये और सारी बात दासी ने पांडवों को बताई| तब पांडव क्रोध में द्रोपदी की रक्षा करने के लिए उसी और भागे जिस और जयद्रथ का रथ गया था |

थोड़ी आगे जाकर उन्हें द्रोपदी सहित रथ मिल जाता है और सहदेव द्रोपदी को बचाने के लिए रथ पर चड़ जाता है और जयद्रथ को चोट मार देता था बाकी सभी पांडव जयद्रथ की सेना के पीछे पड जाते है और जयद्रथ की सेना डर कर भागने लगती है|

जयद्रथ भी डर जाता है और पैदल ही भागने लगता है | सहदेव को छोडकर बाकी सब पांडव जयद्रथ का पीछा करने लगते है और उसे पकडकर खूब मारते है तब अर्जुन बोलते है की भैया भीम इसके प्राण नही लेंगे हम|

इसके प्राण लेने के लिए इसे भैया युधिष्ठिर के लिए छोड़ देते है तब भीम अर्जुन के कहने पर जयद्रथ को छोड़ देता है इसके बाद वन में जाकर जयद्रथ भगवान शिव की तपस्या करता है और शिव जी उसकी तपस्या से प्रसन्न हो जाते है और जयद्रथ के सामने प्रकट हो जाते है तब शिव जी जयद्रथ को वर मांगने को बोलते है और जयद्रथ पांचो पांडवों पर विजय प्राप्त करने का वर मांगता है परन्तु शिव जी कहते है की:-

‘हे जयद्रथ पांडव अजय है कृष्ण नारायण के और अर्जुन नर के अवतार है मै अर्जुन को त्रिलोक विजय और पाशुपतास्त्र पहले ही दे चुका हूँ पर हाँ तुम अर्जुन के ना होने पर शेष पांडवों को एक बार को पीछे जरुर हटा सकते हो यह कहकर भगवान वहा से अंतर्ध्यान हो गये’

महाभारत का कीचक वध – Full Mahabharat Katha in Hindi – Complete Mahabharata Story In Hindi

पांडवों को राजा विराट के राज्य में रहते हुए दस माह निकल गये थे एक दिन राजा विराट का साला अपनी बहन सुदेशना से मिलने हेतु आया जब उसकी दृष्टि सैरंध्री (जो की द्रोपदी थी) पर पड़ी|

तो वह काम पीड़ित हो उठा और सैरंध्री से अकेले में मिलने की जिद में रहने लगा| द्रोपदी उसकी गंदी नजर को पहचान गयी और द्रोपदी ने महाराज विराट से कहा की कीचक मुझ पर गंदी नजर डाल रहा है|

मेरे पांच पती है वो कीचक को मार देंगे लेकिन किसी ने भी द्रोपदी की बात पर ज्यादा ध्यान नही दिया| लाचार होकर द्रोपदी ने भीमसेन को बता दिया की कीचक द्रोपदी पर नजर डाल रहा है तब भीमसेन ने द्रोपदी से कहा की आप कीचक को अर्धरात्रि मेंनृत्यशालामें मिलने का आदेश दे तो न्र्त्यशाला में आपकी जगह मै जाकर उसका वध कर दूंगा.

द्रोपदी ने कीचक को कह दिया की आप रात्री में न्र्त्यशाला में आ जाये| इस संकेत से कीचक बहुत खुश था और वह रात्री में द्रोपदी से मिलने की चाह में निकल पड़ा|

वहा भीमसेन द्रोपदी की साडी से लिपटा हुआ लेटा था| उन्हें सैरंध्री समझकर कीचक बोला की मेरा मन तुम पर न्योछावर है तभी एक दम से भीम सेन उछलकर उठते है और कहते है की पापी तू अपनी मृत्यु के पास खड़ा है|

भीमसेन ने कीचक को पटक पटक कर मारा और उसकी मृत्यु कर दी| अगली सुबह जब सभी ने कीचक को मरा हुआ देखा तो सभी लोग विलाप करने लगे तब द्रोपदी बोली की मेने कहा था की मेरे पती इसका वध कर देंगे|

सबने गुस्से में कीचक के शव के पास द्रोपदी को बाँध दिया और फिर पांडव उसे बचा भी नही सकते थे क्यूंकि वो अज्ञातवास में थे फिर चुपके से भीमसेन रास्ते में जाकर शरीर पर मिटटी लपेट ली और सबको घेर लिया और सबको मारना शुरू कर दीया और सबको बहुत मारा|

इसके बाद सब वापस महल लोट गये और सब द्रोपदी से डरने लगे और इसके बाद महल में केवल राजकुमार उत्तर ही थे और वे प्रजा से रक्षा के लिए गुहार लगा रहे थे तब द्रोपदी से रहा नही गया और द्रोपदी ने राजकुमार को खूब फटकारा और कहा की आप युद्ध के लिए जाइए तब राजकुमार बोले की मेरे पास कोई भी सारथि नही है अगर मेरे पास कोई भी सारथि होता तो मै कौरवों को अवश्य ही हरा देता|

तब द्रोपदी बोली की आप व्रहनला को सारथि बना कर साथ ले जाइए वह बहुत निपुण सारथि है| वह कुन्तीपुत्र अर्जुन का सारथि रह चुका है आप उसे साथ ले जाइए तब वे इन दोनों साथ में युद्ध के लिए निकले और साथ ही पांडवों का अज्ञातवास भी खतम हो गया था|

अर्जुन की नपुसंकता भी खतम हो गयी थी तब जाते जाते मार्ग में अर्जुन ने अपने अस्त्र शस्त्र ले लिए और जब वह युद्ध भूमि पहुचा तो वहा कौरवों की विशाल सेना भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, दुर्योधन, आदि राजकुमार उन सबको देखकर कहता है की वह इन सब से मुकाबला नही कर सकता तब अर्जुन राजकुमार को समझाते है की मेरे होते आप बिलकुल मत घबराइये आपका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता|

आज मै आपके सामने खुद को प्रकट कर रहा हूँ मै पांडू पुत्र अर्जुन हूँ और कंक युधिष्ठिर है, बल्लभ भीमसेन है तन्तिपाल नकुल है ग्रांथिक सहदेव है|

अब मै इन सब से युद्ध करूंगा तुम इस रथ की बागडोर को सम्भालो| तभी राजकुमार अर्जुन के पैर पकड़ लेते है और युद्ध भूमि में देवदत्त शंख की धवनी गूंज उठती है|

तब अर्जुन को देखकर दुर्योधन बोले की अभी तो इनका अज्ञातवास पूरा भी नही हुआ और इतनी जल्दी यह सामने आ गया तब भीष्म बोलते है की पांडव काल की गती को जानने वाले है मेने भी समय की गणना कर ली है पांडवों का समय पूरा हो गया है.

अब दुर्योधन बोला की अब जब अर्जुन आ ही गया है तो व्यूह रचना कर लेते है फिर भीष्म ने दुर्योधन से कहा की तुम एक तिहाई सेना लेकर हस्तिनापुर की और चलो यह देखकर की दुर्योधन रणभूमि से लोट रहा है अर्जुन ने अपने रथ को दुर्योधन के रथ के पीछे लगा लिया और उसे घेर लिया और असंख्य बाणों से उसे व्याकुल कर दिया.

अर्जुन के बाण से डरकर दुर्योधन के सैनिक भागने लगे, सारी गाय भी विराट नगर की और भागने लगी| दुर्योधन को अर्जुन के बाणों से घिरा देखकर कर्ण, द्रोण, भीष्म आदि सभी उसकी रक्षा के लिए दोड पड़े|

अर्जुन ने कर्ण को सामने देखकर उसपर इतने बाण बरसाए की कर्ण के रथ, घोड़े, सारथि, सब भाग गये अत: बाद में कौरवों को अर्जुन के सामने घुटने टेकने पड़े.

हमने यहा Mahabharat Katha के आधे भाग का ज्ञान लिया है| अगर आपको इसके बारें में अधिक पढ़ना है तो आप महाभारत कथा भाग 3 – कुरुक्षेत्र में हुआ भयंकर महाभारत युद्ध पर क्लिक करें और पूरी महाभरत का ज्ञान प्राप्त करें. “धन्यवाद”

भारत का इतिहास ⇓

महाभारत कथा भाग 3 – कुरुक्षेत्र में हुआ भयंकर महाभारत युद्ध

सम्पूर्ण महाभारत कथा की कहानी हिंदी में

हमने पहले 2 भाग में महाभारत के आधे भाग का ज्ञान कर लिया था अब हम बाकी की महाभारत कथा की कहानी आज इस भाग में पढ़ेंगे.

अगर आपको महाभारत की पूरी कहानी हिंदी में पढनी और अच्छे से समझनी है तो आप पहले इसके पिछले भाग को पढ़े सर्वप्रथम उसके बाद इस भाग को पढ़े तभी आपको सम्पूर्ण महाभारत कथा अच्छे से समझ आएगी.

मै उम्मीद करता हूँ की महाभारत कथा के भाग 1 और भाग 2 को आपने पढ़ लिया होगा| तो चलिए अब इस आखिरी भाग को पढ़ना प्रारंभ करते है.

पांडवों का राज्य – महाभारत कथा हिंदी में

जब कौरव रण भूमि से भाग गये थे तब पांडवों ने अपने आप को सबके सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट कर दिया था| जब राजा विराट को पता चला की वह पांडव है तब राजा विराट बहुत खुश हुए|

राजा विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से कर दिया था| इस विवाह में श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम तथा सभी बड़े बड़े राजा सम्मलित थे.

अर्जुन के पुत्र के विवाह के बाद पांडव अपने राज्य वापस लोटना चाहते थे इसीलिए उन्होंने श्री कृष्ण को अपना दूत बनाकर हस्तिनापुर भेजा |

श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गये और वहा उनका यथोचित सत्कार हुआ फिर श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र को बोला “हे राजन पांडवों ने यह कहलवाया है हमने अपना वनवास व् अज्ञातवास पूरा कर लिया है अब आप हमे हमारा आधा राज्य वापस लोटा दीजिये”

वहा बैठे सभी लोगो ने धृतराष्ट्र को समझाया की आप पांडवों का राज्य वापस लोटा दे लेकिन दुर्योधन को यह बात सुनकर बहुत गुस्सा आया और उसने सभी के सामने कहा की मेरे पिता धृतराष्ट्र ज्येष्ठ पुत्र है और मै उनका ज्येष्ठ पुत्र हूँ चाचा पाण्डु का पिताजी धृतराष्ट्र के होते हुए किसी भी राज्य पर कोई अधिकार नही बनता मेरे पिता का अधिकार बनता है और मै मेरे पिता का राज्य किसी को भी देने की अनुमति नही देता|

मै किसी को भी सुई की नोक जितनी सम्पत्ति भी नही दूंगा यदि पांडवों को राज्य चाहिए तो वो हमसे युद्ध करे| सभी ने दुर्योधन को बहुत समझाया लेकिन दुर्योधन अपनी ही बात पर अड़ा रहा और यह बात सुनकर श्री कृष्ण पांडवों के पास वापस चले गये| अब पांडवों और कौरवों के बिच युद्ध निश्चित हो गया.

एक दिन दुर्योधन श्री कृष्ण से युद्ध में सहायता प्राप्त करने के लिए द्वारकापुरी गये| जब दुर्योधन श्री कृष्ण के पास गये तो श्री कृष्ण निद्रा मग्न थे|

अत: दुर्योधन कृष्ण जी के सिरहाने जा बेठा इसी के थोड़ी देर बाद ही पाण्डु पुत्र अर्जुन भी श्री कृष्ण के पास इसी कार्य के लिए पहुचे और उनको सोया देखकर वो उनके पैरों की और बैठ गये|

जब श्री कृष्ण उठे तो उनकी दृष्टि अर्जुन पर पड़ी और अर्जुन के कुशल मंगल हाल पूछने के बाद कृष्ण जी ने आने का कारण पूछा फिर अर्जुन बोले|

भगवान मै आपसे युद्ध के लिए सहायता लेने आया हूँ तभी दुर्योधन भी बोला मै भी आपसे सहायता लेने आया हूँ क्यूंकि मै अर्जुन से पहले आया था इसीलिए सहायता पहले मांगने का अधिकार मेरा है|

तभी भगवान श्री कृष्ण बोले की मेरी नजर पहले अर्जुन पर पड़ी है और तुम कहते हो की तुम पहले आये हो तो इसीलिए मै तुम दोनों में से किसी एक को अपनी पूरी सेना दे दूंगा और एक के साथ खुद हो जाऊँगा लेकिन मै ना ही युद्ध करूंगा और ना ही शस्त्र धारण करूंगा अब आप लोग निश्चय कर ले की किसे क्या चाहिए.

अर्जुन ने श्री कृष्ण को माँगा और यह सुनकर दुर्योधन खुश हो गया क्यूंकि वह विशाल सेना की वजह से ही श्री कृष्ण के पास आया था| श्री कृष्ण बोले की अर्जुन मैंने कहा था की मै युद्ध नही करूंगा फिर भी तुमने मेरा चयन क्यों किया ? तब अर्जुन बोले भगवान आप जहा है वहा विजय ही विजय है इसिलए मेरी इच्छा है की आप मेरे युद्ध में मेरे सारथी बने.

महाभारत में शांतिदूत श्री कृष्ण – महाभारत का युद्ध

युधिष्ठिर अपनी सात अक्षौहिणी सेना के साथ युद्ध करने के लिए त्यार हो गए फिर भगवान् श्री कृष्णा दुर्योधन के पास दूत बन कर गए उन्होंने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी दुर्योधन से कहा की दुर्योधन तुम पांडवों को या तो राज्य दे दो या फिर पाँच ही गाँव दे दो.

यह बात सुनकर दुर्योधन बोले की मै एक सूई की नोंक जितना भी हिस्सा पांडवों को नही दूंगा मै इनसे युद्ध करूंगा यह बात कहकर दुर्योधन श्री कृष्णा को बंदी बनाने के लिए उघत हो गया फिर भगवान् श्री कृष्णा ने दुर्योधन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराकर भयभीत कर दिया|

इसके बाद विदुर ने भगवान् कृष्णा को अपने घर ले जाकर उनका आदर सत्कार किया इसके बाद ही कृष्णा जी युधिष्ठिर के पास गए और बोले महाराज आप दुर्योधन के साथ युद्ध शुरू करे.

अब दोनों सेना महाभारत युद्ध के लिए मैदान में उत्तर चुकी थी तभी श्री कृष्णा ने अर्जुन को समझाया की पार्थ आप शोक के योग्य नही है क्यूंकि सिर्फ शरीर मरता है और आत्मा कभी नही मरती, आत्मा हमेशा जीवित रहती है|

अर्जुन यह बात सुनकर युद्ध क्षेत्र में उत्तर गए दोनों और से शंख ध्वनि हुई और दुर्योधन की तरफ से पहले पितामह भीष्म सेनापती हुए| पांडवोंके सेनापती शिखंडी हुई|

महाभारत कथा का यह युद्ध बहुत ही बड़े संग्राम जैसा था और सभी देवता इस युद्ध को आसमान से देख रहे थे और अर्जुन ने दस दिन तक युद्ध लगातार करके दुर्योधन की अधिकाँश सेना को मार डाला था.

महाभारत में भीष्म पितामह का वध और महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य का वध

भीष्म बाणों की मृत्यु शैया पर लेटे हुए थे| अर्जुन ने भीष्म पर खूब बाण चलाए लेकिन उनकी मृत्यु नही हुई और अर्जुन जानता था यदि भीष्म की मृत्यु नही हुई तो यह युद्ध समाप्त नही होगा इसीलिए अर्जुन ने भीष्म से ही पूछा की आपकी मृत्यु करने का क्या कारण है तब उन्हें भीष्म ने बताया की:-

मै अपने पिछले जन्म में एक बार शिकार पर जा रहा था तब मेने धोके से एक साप को तीर मार दिया था वह साप दस दिन तक तड़पता रहा फिर उसकी मृत्यु हुई उसी के शाप के कारण आज मेरी भी यही हालत है और अगर तुम अपने रथ पर शिखंडी को बिठा लो तब मेरी मृत्यु संभव है क्यूंकि वे ही पिछले जन्म में अम्बा थी और मै अब भी शिखंडी को नारी का रूप मानता हूँ.

अर्जुन ने यही किया और शिखंडी को अपने रथ पर बिठाया और भीष्म पर बाण चला दिए तब भीष्म ने अपना धनुष छोड़ा और उनकी मृत्यु हो गयी इसके बाद आचार्य द्रोण ने सेनापती का भार संभाला.

पाण्डवों की सेना में धृष्टद्युम्न सेनापती बने उन दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ युद्ध में गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए एक चक्रव्यूह की रचना की | पांडवों के पक्ष में अर्जुन और श्री कृष्णा ही चक्रव्यूह तोडना जानते थे, अर्जुन पुत्र को सिर्फ चक्रव्यूह में प्रवेश करना आता था निकलना नही|

अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुस गया और तभी कौरवों ने चक्रव्यूह में प्रवेश करने का द्वार बंद कर दिया और तब भी अर्जुन पुत्र ने हार नही मानी वह अकेला ही लड़ता रहा और उसने कई योद्धाओं को मार गिराया|

तब ही सूर्यपुत्र कर्ण और गुरु द्रोण ने अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को मारने की सोची और उन्होंने अभिमन्यु के रथ के पहिये में तिर मार दिया और अभिमन्यु गिर गए और तभी कौरवों ने अभिमन्यु पर आक्रमण करके उसकी मृत्यु कर दी इसके बाद जब अर्जुन को पता चलता है की अभिमन्यु मर चूका है और अभिमन्यु की मृत्यु का कारण जयद्रथ है तो वे प्रतिज्ञा ले लेता है की यदी वह सूर्योदय तक जयद्रथ को ना मार पाया तो वह अग्नि समाधी ले लेगा.

महाभारत युद्ध समाप्ति के बाद क्या हुआ – महाभारत कथा हिंदी में

दुर्योधन की सारी सेना युद्ध में मारी गयी पांडवों की भी आधी सेना नष्ट हो चुकी थी| अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने रात्रि में पांडवों के शिविर में जाकर पांडवों के पांचों पुत्रों को मार दिया तब द्रोपदी यह देखकर विलाप करने लगी.

अश्वत्थामा ने पांचों पुत्रों के सर काट दिए थे| अर्जुन अब प्रतिज्ञा ले चूका था की वह अश्वत्थामा का विनाश कर देगा और अर्जुन के डर से अश्वत्थामा वहा से भाग निकला|

भयभीत होकर उसने बह्रमास्त्र का प्रहार अर्जुन पर कर दिया तब अर्जुन ने श्री कृष्णा से पूछा की भगवान सामने से यह जो अग्नि मेरी और आ रही है यह क्या है तब श्री कृष्णा ने बताया की यह अग्नि भ्रम अस्त्र है जो अश्वत्थामा ने छोड़ा है अब तुम भी बह्रमास्त्र छोड़ कर इस बह्रमास्त्र को रोको तब अर्जुन ने भी बह्रमास्त्र का वार किया|

दोनों अस्त्र एक दूसरे से टकराये और अग्नि प्रज्वलित हुई जो तीनो लोको को तप्त करने लगी इस अग्नि से सब और ज्वाला ही ज्वाला हो गयी और यह देखकर अर्जुन ने दोनों बह्रमास्त्र को शांत कर दिया और अश्वत्थामा को पकड़ लिया.

अर्जुन ने अश्वत्थामा को बाँध कर द्रोपदी के सामने प्रकट किया और द्रोपदी को गुरुपुत्र को बन्दा देखकर दया आ गयी| द्रोपदी ने तो गुरुपुत्र को छोडने के लिए बोल दिया लेकिन भीम का क्रोध शांत नही हुआ और फिर अर्जुन ने टुवर्ड्स से अश्वत्थामा के केश काट डाले और उसकी मणि निकाल ली और उसे श्री हीन कर दिया|

इसके बाद सभी पांडव अपने स्वजनों को जलदान देने के लिए जाते है तभी उनकी वधू उत्तरा जोर जोर से चिल्लाती है “मुझे बचाओ मुझे बचाओ” और श्री कृष्णा देखते है की अश्वत्थामा ने फिर से पांडव कुल को नष्ट करने के लिए बह्रमास्त्र का प्रयोग किया है जिससे वधू उत्तरा का गर्भ तपने लगा है|

तभी भगवान श्री कृष्णा अश्वत्थामा को शाप देते है की वह समय के अंत तक नर्क में वास करेगा और श्री कृष्ण उस बह्रमास्त्र को रोक कर उस तप से एक शिशु को उसकी गर्भ में पुनर्जीवित कर देते है| इस तरह यह नया शिशु पांडवों के कुल को आगे बढाता है.

अब युद्ध समाप्त हो गया था और पांडवों को राज्य मिल गया था| इसके बाद भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को साथ लेकर अपने घर द्वारिका लेकर गए और वहाँ जाकर उन्होंने तपस्या में लीन होकर अपना शरीर त्याग दिया इस लोक को छोड़कर चले गए थे.

अर्जुन और सारा कुल उनके बिना शांत शांत सा हो गया था, सब और शांति सी फेल पड़ी थी, पेड़ भी सुख गए थे और सभी जानवरो ने भी खाना पीना बंद सा कर दिया था और सभी लोग मन से परेशान से रहने लगे थे, सूर्य का प्रकाश भी घट सा गया था, सभी शोक मग्न हो गए थे और इसके बाद इंद्र के लाये रथ पर सवार होकर सभी स्वर्ग में चले गए|

“जो भी व्यक्ति इस महाभारत का पाठ करेगा वह स्वर्ग में अपनी जगह अवश्य बना लेगा”

महाभारत कथा की कुछ महत्वपूर्ण बातें – महाभारत के बाद का इतिहास

महाभारत की घटना एक अद्भुत घटना है यह घटना एक बहुत ही अचंबित कर देने वाली घटना है क्यूंकि इस युद्ध का असली कारण सिर्फ चचेरे भाइयों की लड़ाई है|

कुरुक्षेत्र में हुए इस युद्ध में इतनी जाने गयी है की आज भी वहा की मिटटी का रंग लाल ही है| महाभारत की समाप्ति के बाद पांडवों का शासन से मोह ही खत्म हो गया था क्यूंकि पाण्डव श्री कृष्णा के जाने के कारण शोक अवस्था में थे.

सबसे पहले द्रोपदी की मृत्यु हुई थी और इसके बाद सभी पांडव मरे लेकिन एक युधिष्ठिर ऐसे थे जिन्हे शरीर के साथ स्वर्ग में प्रवेश मिल गया था| स्वर्ग जाते समय पांडवों के साथ एक काला कुत्ता भी यात्रा पर था और वह काला कुत्ता युधिष्ठिर के साथ अंत तक चलता रहा क्यूंकि बाकि सब पाण्डव और द्रोपदी अपने देह पहले ही त्याग चुके थे|

जब यमराज युधिष्ठिर को लेने के लिए आये और युधिष्ठिर बोले में स्वर्ग अपने भाईयो के बिना नही जाऊंगा तब यमराज बोले की वे सब आपको वही मिलेंगे और यह काला कुत्ता मेरा ही स्वरूप है जो आपके साथ है| तब युधिष्ठिर ख़ुशी ख़ुशी यमराज के साथ स्वर्ग चले गए.

एक अहम जानकारी यह भी है की अपने स्वर्ग की यात्रा से पहले पांडव अपना राज्य परीक्षित के पास छोड़ गए थे उनके बाद राजा परीक्षित ने ही हस्तिनापुर में शासन किया और राजा परीक्षित के वंशज निचक्षु इस शासन के आखरी राजा थे.

जब युधिष्ठिर स्वर्ग में गए तब उन्होंने देखा की उनके भाई वहा नही है और कौरव वहा है तब उन्होंने यमराज से पूछा मेरे भाई कहा है तो उन्हें पता चला की उनके भाई नर्क में है|

युधिष्ठिर अपने भाइयों को देखने नर्क गए और उनका यह हाल देखकर युधिष्ठिर ने ईश्वर से पूछा की मेरे भाई यहा क्यों है ? तब ईश्वर ने बताया की युद्ध के आखिर तक कौरव अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते रहे उन्होंने सच्चे क्षत्रिय की तरह अपने प्राणो को त्यागा है और अंतिम में पांडवों में जरा अहंकार आ गया था|

युद्ध जितने का हिज कारण उन्हें नर्क में रखा गया है लेकिन यह कुछ समय के लिए ही है कुछ समय बाद पांडवों को स्वर्ग में और कौरवों नर्क में भेज दिया जायेगा.

प्रिय पाठकों, मै हिमांशु ग्रेवाल आपके सामने महाभारत कथा का एक छोटा रूप लेकर आया हूँ| महाभारत एक बहुत बड़ी कहानी या गाथा है इसे समझना मुश्किल है| यह मैंने आपको सरल भाषा में पूरी महाभारत का ज्ञान दिया है मुझे उम्मीद है की आपको यह जानकारी पसंद जरूर आई होगी.

आपको सम्पूर्ण महाभारत कथा पढ़ कर कैसा लगा हमको कमेंट के माध्यम से जरुर बताये अथवा जितना हो सके इस लेख को सोशल मीडिया पर शेयर करें. “धन्यवाद”

भारत का इतिहास ⇓

The Intelligent Investor Book Summary in Hindi | द इंटेलिजेंट इन्वेस्टर

The Intelligent Investor Book Summary in Hindi

आज के इस लेख में इन्वेस्टमेंट और इन्वेस्टर के टॉपिक पर हम बात करेंगे जिसको हमने The Intelligent Investor Book Summary से लिया है तो चलिए शुरू करते हैं-

The Intelligent Investor Book Summary in Hindi

क्या आपको पता है कि इस दुनिया मे हम सभी लोग सिर्फ और सिर्फ चार तरीके से ही पैसे कमा सकते है,

  1. As a Employee ⇒ एक कर्मचारी के रूप में, जैसे – किसी भी बड़े से बड़े कंपनी का EMPLOYEE या सरकारी ऑफिस का कर्मचारी, एक दैनिक वेतन वाला मजदुर|
  2. As a Self Employed ⇒ एक खुद के छोटे ऑफिस या दुकान के मालिक के रूप में जैसे – दुकानदार, छोटा बिजनेसमैन या फिर डॉक्टर, वकील, CA.
  3. As a Businessman ⇒ एक बिज़नसमैन के रूप पे जैसे – एक बहुत बड़ी कंपनी का मालिक, जिसके पास एक ऐसा बिज़नस है जो सिस्टम पर काम करता है, और उसका मालिक वहा नहीं हो तो भी कंपनी बिलकुल सही तरह से काम करती है.
  4. As a Investor ⇒ एक निवेशक के रुप में जैसे – किसी भी तरह का निवेशक, जो किसी निवेश में पैसे लगाकर इनकम कमाता है|

आप चाहे कोई भी हो, आप इन चारो में से कोई एक हो सकते है, अगर आप पहले दो में से है, जैसा कि इस दुनिया के 90% लोग होते है, तो आप सिर्फ ACTIVE INCOME कमा रहे है, और अगर आप तीसरे और चौथे केटेगरी में आते है, तो आप बेशक बहुत अमीर आदमी है, क्योकि इस केटेगरी में लोग PASSIVE INCOME कमाते है.

ये लोग पैसे के लिए काम नहीं करते, बल्कि पैसा इनके लिए काम करता है|

अगर आप सच में अमीर बनना चाहते है, और फ़िलहाल अगर आप पैसे कमाने वाली पहली केटेगरी में है तो आपको अपनी चालू इनकम के साथ साथ एक निवेशक के रूप में भी INCOME कमाने के बारे में जरुर सोचना चाहिए, और ऐसा मुमकिन है एक तरीके से => इन्वेस्टमेंट करके|

कहने का अर्थ है कि आप एक इन्वेस्टर बन जाए, इससे आपके अमीर बनने की सम्भावना बढ़ जाती हैं|

हर चीज़ मुमकिन है लेकिन उसके लिए ज़रूरी है की चीज़े सही दिशा में भी हो, क्यूंकि कहते हैं ना – Hard work in the right direction is the key of success.

The Intelligent Investor Book Summary By Benjamin Graham

आज इस लेख में हम एक महान इन्वेस्टर – Mr. Benjamin Graham द्वारा लिखी हुई किताब “The intelligent Investor Book Summary” जानेंगे.

Mr. Benjamin Graham दुनिया के सबसे सफल इन्वेस्टर Warren Buffet के गुरु थे, जब वो 19 वर्ष के थे तब उन्होंने इस किताब को पढ़ा था और कहा था की यह किताब आज तक की इन्वेस्टर पर लिखी हुई सबसे अच्छी किताब है.

Warren Buffet ने और भी कई किताबे पढ़ी थी, और किताब के लेखक से वो बहुत Inspire भी होते थे|

एक बार जब उनको मालूम हुआ कि वो लेखक कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं तो उन्होंने वहा एडमिशन ले लिया, सिर्फ Mr. Benjamin Graham की वजह से|

Mr. Benjamin ने इन्वेस्टिंग को कुछ इस तरह से डिफाइन किया है-

“An investment operation is one which, upon thorough analysis, promises safety of principal and an adequate return. Operations not meeting these requirements are speculative.”

Investment वो है जो आपकी पूरी एनालिसिस के बाद आपकी प्रिंसिपल यानिकी आपकी इन्वेस्टमेंट को सेव रखती है, और आपको उसपर उचित Return देती है इसके अलावा जो भी है वो सट्टेवाज़ी है|

इन्वेस्टमेंट के इस डेफिनेशन में 3 पॉइंट है – Money Investment Tips in Hindi

  1. आपको कंपनी और उसके बिज़नस को अच्छी तरह से एनालिसिस करना चाहिए.
  2. आपको अपनी इन्वेस्टमेंट राशी को लोसिस से बचाना चाहिए.
  3. आपको इन्वेस्टमेंट पर उचित Return मिलने चाहिए.

तो दोस्तों हम युही किसी को इन्वेस्टर नहीं बोल सकते है| जो इस डेफिनिशन से इन्वेस्टिंग करते हैं उनको इन्वेस्टर कहा जाता है| अगर आप भी इन्वेस्टिंग करते है तो आपको सोचना चाहिए कि क्या आप इन्वेस्टिंग कर रहे हैं या फिर Speculating कर रहा हूँ.

यह दोनों दो अलग अलग चीज़े हैं इसलिए जब आप इन्वेस्टिंग कर रहे हैं तो सिर्फ उसके बारे में सोचे और जब Speculating कर रहे हैं तो स्पेकुलेशन के बारे में.

इन्वेस्टर बिज़नस के वैल्यू के अनुसार स्टॉक की वैल्यू निकालते हैं वही स्पेकुलेटर सोचते हैं कि शेयर प्राइज बढ़ जायेगी क्यूंकि कोई न कोई उस स्टॉक के लिए ज्यादा पैसे पे करेगा.

इंटेलीजेंट इन्वेस्टर शेयर प्राइज गिर रही है इसलिए कभी भी शेयर नहीं बेचते बल्कि चेक करते हैं कि कंपनी के बिज़नस की वैल्यू में कोई चेंज हुआ है क्या ?

Mr. Benjamin का अलग रूल है की इन्वेस्टर को कभी भी कंपनी का पास्ट देख कर कभी भी उनके फ्यूचर का अनुमान नहीं लगाना चाहिए.

जब सारे इन्वेस्टर को लगता है कि किसी स्टॉक में गारंटीड पैसा बनेगा तो वो उसे खरीदने लगते हैं, जिससे शेयर के प्राइज बढ़ कर और वैल्यूड हो जाते हैं.

इन्वेस्टर को पता होता है कि इन्वेस्टमेंट में सक्सेस के लिए उन्हें “Buy low sale high” का रूल फॉलो करना होगा, फिर भी वो इसका उल्टा कर बैठते हैं.

इन्वेस्टिंग में Generally यह माना जाता है कि आप जितने ज्यादा रिस्क लोगे उतने ही ज्यादा आपको Return भी मिलेंगे, लेकिन Mr. Benjamin ऐसा नहीं मानते है उनका कहना है कि Rate of Return इस बात पर निर्भर करता है कि इन्वेस्टर कितना Intelligent एफर्ट ले रहा है, और उसके लिए ज्यादा एनर्जी और समय लगता है.

Mr. Benjamin का अलग रूल है कि IPO में इन्वेस्ट करते वक़्त आपको ज्यादा केयरफुल रहना चाहिए, इसके पीछे दो वजह है-

  1. इनको ज्यादा ज़ोरों शोरो के साथ प्रमोट किया जाता है|
  2. इनको मार्किट में तब लाया जाता है जब मार्किट के रेट हाई होते है|

दोस्तों ऐसी कंडीशन कंपनी के लिए तो अच्छी होती है लेकिन इन्वेस्टर के लिए नहीं अच्छी साबित नहीं होती है| अगर आपने Observe किया हो तो दोस्तों US में 1968 – 69 में जब Bull Run चल रहा था तब 781 कंपनी के IPO आये थे.

  • 1974 में जब Bear Run चल रहा था तब सिर्फ 9 कंपनी के IPO आये थे|
  • 1975 में जब Bear Run चल रहा था तब सिर्फ 14 कंपनी के IPO आये थे|

तो इसलिए Intelligent investor को ऐसी सिचुएशन को अच्छे से परखना आना चाहिए.

IPO में शेयर के प्राइज Investment Bank निश्चित करती है वही वो कंपनी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने के बाद लोग Decide करते हैं| इसलिए जब Investment Bank शेयर के प्राइज निश्चित करती है तो उसमे बार्गेन मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है, वही लोगो के ग्रीड और फियर की वजह से सेकेंडरी मार्किट में बार्गेन Opportunity मिल जाती है.

बार्गेन क्या होता है – Benjamin Graham The Intelligent Investor in Hindi

जब किसी स्टॉक की वैल्यू उसके सेल्लिंग प्राइज से ज्यादा होती है तो उसको बार्गेन इशू बोलते हैं.

Mr. Graham का कहना है की कोई स्टॉक तब अच्छा होता है जब उसकी वैल्यू उसके selling price से 50% ज्यादा हो.

उदाहरण के लिए – मान लीजिये एक स्टॉक की कीमत 100 रुपया है तो वह अच्छा स्टॉक तभी कहलायेगा जब उसकी कीमत 150 रूपये या उससे ज्यादा हो जाए.

बार्गेन पता करने का एक और तरीका है – जब कोई स्टॉक उसके नेटवर्क कैपिटल से भी कम दाम पर सेल हो रहा हो तो वो एक अच्छा स्टॉक हो सकता है.

नेटवर्क कैपिटल का अर्थ है » Networking capital » Current Assets » Total Liabilities

जब आप किसी स्टॉक में इन्वेस्ट कर रहे हो तो आपको एनालिसिस करते वक़्त अपने दिमाग में यह बात रखनी चाहिए कि आप उस कंपनी को खरीदने जा रहे हैं|

इसलिए जब कंपनी के स्टॉक नेटवर्क कैपिटल से कम भाव में मिल रहे इसका अर्थ है कि आप कंपनी की बिल्डिंग और मशीनरी के लिए पे नहीं कर रहे हैं.

ज्यादातर इन्वेस्टर क्राउड को फॉलो करते हैं, इसलिए अगर कोई स्टॉक बार्गेन में मिल रहा है तो वो उससे भी दूर रहते हैं, क्यूंकि बाकी लोग उस स्टॉक में इन्वेस्ट नहीं करते हैं और जो स्टॉक आलरेडी बहुत ओवर वैल्यूड है उसमे इन्वेस्ट करते हैं क्यूंकि बाकी लोग उसमे इन्वेस्ट करते हैं|

जबकि इंटेलीजेंट इन्वेस्टर जब कोई स्टॉक अंडर वैल्यूड होता है तब उसे खरीद लेता है और जब वो बहुत ओवर वैल्यूड होता है तो उसको बेच देते हैं.

कुछ लोग समझते हैं कि जब किसी स्टॉक की वैल्यू बहुत बढ़ गई है तो वो स्टॉक ओवर वैल्यूड हो गया है और जब किसी स्टॉक की वैल्यू गिर गई है तो स्टॉक अंडर वैल्यूड हो गया है और इस तरह से वो मालूम करते हैं शेयर के प्राइज के बारे में.

जब कि शेयर की वैल्यू पता करने के लिए हमे उसके बिज़नस की वैल्यू पता करनी होगी| यानिकी बिज़नस के वैल्यू को उसके शेयर प्राइज से Compare करना होगा.

उनका अगला रूल है – Don’t try to time the market – The Intelligent Investor Book Summary

स्टॉक मार्किट में उतार चढ़ाव होता रहता है, और इन्वेस्टर इसका फायदा लेना चाहते हैं और इसी वजह से वो मार्किट को टाइम करने के कोशिश करते हैं|

यानिकी आने वाले टाइम में क्या होगा ये पता लगाने की कोशिश करते हैं| यदि उनको लगता है कि मार्किट ऊपर बढ़ेगा तो वो शेयर खरीद लेते हैं.

अगर आप अंदाज़ा लगाना शुरू कर देते हैं कि मार्किट ऊपर जायेगा या नीचे तो आप एक स्पेकुलेटर बन जाते हैं और इस चक्कर में कई लोगो ने बड़े-बड़े लोस्सेस भी उठाये हैं.

Brokerage Former analyst लगातार मार्किट को टाइम करने की कोशिश करते हैं क्यूंकि वो उनका बिज़नस है और उनको उसके लिए पैसे भी मिलते हैं| एक Intelligent Investor को कभी भी इसमें नहीं पड़ना चाहिए.

हर इन्वेस्टर को यह बात समझनी चाहिए की मार्किट में उतार चढाव होते रहते हैं और यह इन्वेस्टर को अच्छी Opportunity ढूंढने में मदद करते हैं.

चलिए एक उदाहरण की मदद से समझते हैं |

1929 में A & P अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज जिसका नाम अब न्यू योर्क स्टॉक एक्सचेंज हो गया है उसपर लिस्ट हुआ था, उसके बाद उसका स्टॉक प्राइज $494 तक पहुच गया.

1932 के ग्रेट डिप्रेशन की वजह से उसके स्टॉक क प्राइज गिरते-गिरते $104 पर पहुच गया और फिर 1936 में उसका शेयर प्राइज $34 पर आ गया.

उन दिनों पूरी कंपनी $126 मिलियन डॉलर में मिल रही थी, जबकि कंपनी के पास $85 मिलियन डॉलर तो सिर्फ कैश थी, और उस वक़्त कंपनी के पास $134 मिलियन डॉलर का वोर्किंग कैपिटल था.

A & P उस वक़्त अमेरिका की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी थी, और कंपनी का इम्प्रैशन भी बहुत अच्छा था फिर भी उन दिनों कंपनी $126 मिलियन डॉलर में मिल रही थी| इसके पीछे तीन ही कारण थे-

  1. बाते ऐसी चल रही थी कि कंपनी के मालिक पर स्पेशल टैक्स लग सकता है.
  2. कंपनी का नेट प्रॉफिट पिछले साल कम था.
  3. पूरा मार्किट ही डिप्रेस्ड था.

Mr Graham का कहना है कि पहला कारण सिर्फ एक डर था और दूसरा और तीसरा कारण कुछ समय के लिए ही है.

1936 में A & P के शेयर प्राइज $36 थे वही 1937 में $80 था और उसका प्राइज पर अर्निंग रेश्यो 12 था|

Mr Graham के अनुसार $80 पर भी A & P का स्टॉक मार्किट Attractive था|

अगर किसी इन्वेस्टर ने 1937 में A & P के शेयर $80 में ख़रीदे होते तो उसके प्राइज $36 होने पर भी उसके लिए कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि बिज़नस तब भी सेम था|

अगर उसके बाद पैसा और चाह होती तो वो $36 पर भी A & P के और शेयर खरीद लेता.

1939 में A & P की शेयर प्राइज $117 तक चली गई और 1961 में $705 हो गई और उसका प्राइज पर अर्निंग रेश्यो 30 हो गया.

उस वक़्त सभी के नजरो में A & P चढ़ा हुआ था और कोई भी उस Optimism को कोई Justification नहीं था| कंपनी के फाइनेंसियल कंडीशन तब खराब हो रहे थे स्टॉक ओवर वैल्यूड हो गया था फिर भी लोग उसपर Optimistic थे.

फिर 1962 में उसके शेयर प्राइज $340 हुए, पर $340 शेयर प्राइज 1937-38 जैसे बार्गेन प्राइज नहीं था|

बाद में A & P की शेयर प्राइज 1970 में गिर कर $180 हो गई| इसी तरह मार्किट में उतार चढ़ाव चलता रहता है.

1938 में $36 होने पर कोई उसका शेयर खरीदने को तैयार नहीं था, वही1960 में उसका शेयर प्राइज ओवर वैल्यूड होने के बावजूद लोग खरीदने को तैयार थे.

1961 की A & P 1938 की A & P से बड़ी कंपनी ज़रूर हुई थी, पर वो 1938 की A & P की तरह अच्छी तरह नहीं चलाई जा रही थी और वैल्यूएशन के हिसाब से उतनी Attractive भी नहीं थी.

दोस्तों इस स्टोरी से हमे सिख मिलती है कि शेयर प्राइज कई बार extremely ऊपर निचे हो जाते हैं, और इन्वेस्टर करेज दिखा कर और अलर्ट रह कर ऐसे Opportunity का फायदा ले सकते हैं| और दूसरी बात ये की ज्यादातर बिज़नस की क्वालिटी और करैक्टर लॉन्ग टर्म में बदलते हैं, इसलिए अपनी इन्वेस्टमेंट को Review करना ज़रूरी है.

Market फ्लक्चुएशन का फायदा आप कैसे ले सकते हैं, आइये एक और उदाहरण की मदद से समझते हैं.

मान लीजिये आपने किसी प्राइवेट बिज़नस का यानी जो बिज़नस स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं है उसका करीब $1000 खरीद लिया.

उस कंपनी में आपका एक पार्टनर है जिसका नाम है Mr Market है.

हर दिन वो आपको बताता है कि उसके अनुसार आपकी शेयर की वैल्यू कितनी है ?

इतना ही नहीं अगर आपको और शेयर खरीदने है तो वो आपको और शेयर खरीद के देगा और अगर आपको आपके शेयर बेचने है तो बेच के भी देगा.

Mr Market आपको जो बताता है वो बिज़नस डेवलपमेंट को देख कर कई बार आपको सही लगती है, वही कई बार बताई हुई वैल्यू आपको बहुत सिल्ली लगती है.

अगर आप एक सेंसिबल इन्वेस्टर हो तो आपको Mr Market जो डेली प्राइज बताते हैं आप उसी को उस शेयर की वैल्यू मानोगे?

अगर आप Mr Market की कोर्ट की हुई प्राइज से अग्री करते हो तो ही आप Mr Market की बताई हुई शेयर प्राइज के अनुसार बताई हुई शेयर प्राइज के बिज़नस की वैल्यू लगाओगे और बाकी टाइम उसकी बाते इगनोर करोगे.

अगर Mr Market आपको बहुत ज्यादा हाई प्राइज कोर्ट करता है तो आप ख़ुशी से अपने शेयर उस प्राइज पर बेच दोगे, और अगर बहुत कम प्राइज कोर्ट करता है तो आप ख़ुशी से उससे वो शेयर खरीद लोगे.

शेयर प्राइज में उतार चढाव – The Intelligent Investor Book Summary in Hindi

इन्वेस्टर को जब शेयर प्राइज घट जाती तो खरीदने का और जब प्राइज बढ़ जाती है तो शेयर बेचने का Opportunity देती है और बाकी टाइम वो इन्वेस्टर उस स्टॉक मार्किट पर ध्यान नहीं देते.

स्टॉक मार्किट आप्शन बेसिस पर चलता है, इसलिए फ्लक्चुएशन स्टॉक मार्किट का एक हिस्सा है, इनफैक्ट फ्लक्चुएशन स्टॉक मार्किट की ब्यूटी है.

अगर आप कंपनी के वैल्यू को देख कर कंपनी में इन्वेस्ट कर रहे हो, तो अगर शेयर प्राइज ज्यादा गिरती है तो आपको चिंता करने की ज़रुरत नहीं है, और अगर प्राइज बढ़ जाती है तो बहुत ज्यादा Excited होने की ज़रुरत नहीं है.

Mr Graham कहते हैं कि अगर कोई शेयर गिर रहा है तो सिर्फ इस वजह से उसको मत बेचो, और सिर्फ कोई शेयर बढ़ रहा तो उसे मत खरीदो.

दोस्तों आज का यह लेख अब यही पर समाप्त हो रहा है, अगर आप एक स्टॉक मार्किट में अभी प्रवेश कर रहे है तो आप पहले स्टॉक मार्किट को समझिए और फिर इस किताब को एक बार ज़रूर पढ़िए.

अगर आपको The Intelligent Investor Book Summary से सम्बंधित कुछ पूछना है तो आप कमेंट के माध्यम से पूछ सकते हो अथवा अगर आपको लेख पसंद आया हो तो इसे सोशल मीडिया पर शेयर करें|

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भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है ? – How is The Vice President Elected in India

भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है

आज के इस लेख में हम जानेंगे की भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है ? तो चलिए विशेष जानकारी लेना शुरू करते हैं.

यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि राष्ट्रपति से जुड़ी काफी जानकारी हमे अक्सर न्यूज़ में सुनने और देखने को मिल जाती है| यहाँ तक की हम बच्चो को भी सिर्फ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम ही याद करवाते हैं|

मेरा कहने का अर्थ सिर्फ इतना है की उपराष्ट्रपति का नाम भारत की जनता में कुल शायद 30% को भी नहीं मालूम होगा|

नोट » दोस्तों अगर आप किसी सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे हैं, तो यक़ीनन ही यह लेख आपके लिए फायदेमंद साबित होगा| तो चलिए पढ़ना शुरू करते है

भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है ?

उपराष्ट्रपति के चुनाव के इस लेख में आपको निचे दिए गये कुछ ख़ास प्रश्नों के उत्तर भी मालुम होंगे, जैसे की-

  1. भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है ?
  2. उपराष्ट्रपति बनने के लिए एक इंसान में क्या योग्यता होनी चाहिए ?
  3. एक उपराष्ट्रपति की मासिक आय कितनी होती है ?
  4. क्या हर व्यक्ति उपराष्ट्रपति पद पर बैठ सकता है ?
  5. एक उपराष्ट्रपति का कार्यालय कितने समय तक के लिए रहता है ?
  6. उपराष्ट्रपति बनने के लिए आपको कितने रुपए जमा कराने होते हैं ?
  7. वर्तमान वक्त में भारत के उपराष्ट्रपति कौन है ?
  8. उपराष्ट्रपति पद की चुनावी प्रक्रिया

अगर आप ऊपर दिए गये प्रश्नों के उत्तर जानना चाहते हैं तो इस लेख को अंत तक ज़रूर पढ़े| यह लेख आपके लिए मददगार साबित हुआ या नहीं मुझे कमेंट कर के बताना मत भूलियेगा|

भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है – उपराष्ट्रपति की नियुक्ति कौन करता है ?

उपराष्ट्रपति का चुनाव परोक्ष होता है, उपराष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज करता है| इलेक्टोरल कॉलेज में राज्यसभा और लोकसभा के सांसद शामिल होते हैं| इस पद पर चुना गया व्यक्ति जनप्रतिनिधियों की पसंद होता है.

उपराष्ट्रपति बनने के लिए एक इंसान में क्या योग्यता होनी चाहिए ?

उपराष्ट्रपति बनने के लिए एक व्यक्ति में निम्न बातो का होना अतिआवश्यक है:-

  1. वो शख्स भारत का नागरिक होना चाहिए|
  2. उपराष्ट्रपति बनने के लिए न्यूमतम आयु 35 वर्ष निश्चित की गई है|
  3. वो राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने के योग्य होना चाहिए|
  4. ऐसा व्यक्ति भारत का उपराष्ट्रपति नहीं बन सकता जिसके पास केंद्र या राज्य सरकार या उसके अधीन किसी निकाय में लाभ का कोई पद हो|
  5. अगर संसद के किसी सदन या राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य उपराष्ट्रपति चुन लिया जाता है तो यह समझा जाता है कि उन्होंने उपराष्ट्रपति के पद को ग्रहण करते ही अपना पिछला स्थान खाली कर दिया है|

एक उपराष्ट्रपति की मासिक आय कितनी होती है ?

एक उपराष्ट्रपति की आय किसी बड़े व्यापारी से कम नहीं होती है, इस वक़्त उपराष्ट्रपति की सैलरी 1.25 लाख रूपये है जिसमे की सातवे वेतन आयोग नहीं जोड़ा गया है|

सातवे वेतन लागू होने के बाद एक उपराष्ट्रपति की माशिक आय 3.5 लाख रूपये हो जाएगी|

इतना ही नहीं जो पूर्व उपराष्ट्रपति है उनकी पेंसन में भी बढ़ोतरी होगी, उनको भी अब 1.5 लाख रूपये मिलेंगे जोकि अभी इनको सिर्फ 75 हज़ार रूपये माशिक पेंशन मिलती है.

क्या हर वयक्ति उपराष्ट्रपति पद पर बैठ सकता है ? – भारत के उपराष्ट्रपति का निर्वाचन

इस प्रशन का जवाब हाँ है, आप ऊपर दिए गये पॉइंट्स (उपराष्ट्रपति पद की योग्यता) को ध्यान से पढ़ लीजिये|

एक उपराष्ट्रपति का कार्यालय कितने समय तक के लिए रहता है ?

एक उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष तक के लिए रहता है| यदि पूर्व उपराष्ट्रपति द्वारा कार्यकाल समाप्त होने की वजह से नए उपराष्ट्रपति का चुनाव किया जा रहा हो तो उसका कार्यकाल निधार्रित अवधि पर समाप्त हो जाएगा.

यदि मौत, इस्तीफे, बर्खास्तगी या किसी अन्य वजह से यह पद रिक्त होता है तो जल्द ही नया उपराष्ट्रपति चुन लिया जाएगा| चयनित व्यक्ति का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से पांच दिन का होगा.

उपराष्ट्रपति बनने के लिए आपको कितने रुपए जमा कराने होते हैं ?

उपराष्ट्रपति पद के लिए अभ्यर्थी का नाम 20 मतदाताओं के द्वारा प्रस्तावित और 20 मतदाताओं के द्वारा समर्थित होना आवश्यक है|

साथ ही अभ्यर्थों द्वारा 15,000 रुपए की जमानत राशि जमा करना आवश्यक होता है| इसके बाद निर्वाचन अधिकारी नामांकन पत्रों की जांच करता है और योग्य उम्मीदवार के नाम की पर्ची को बैल्लेट बॉक्स में शामिल किया जाता है.

प्रत्याशी निर्वाचन अधिकारी को लिखित में नोटिस देकर नाम वापस भी ले सकता है, यदि जांच में कोई कमी पाई जाए तो|

वर्तमान वक़्त में भारत के उपराष्ट्रपति कौन है – Who is The Vice President Of India

भारत के उपराष्ट्रपति का नाम श्री वेंकैया नायडू है| यह 1 अगस्त 2017 से वर्तमान में कार्यरत हैं| उनका वर्तमान पता है = उपराष्ट्रपति निवास, 6 मौलाना आज़ाद रोड, नई दिल्ली है|

उपराष्ट्रपति पद की चुनावी प्रक्रिया – भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है ?

राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही उपराष्ट्रपति चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती| उपराष्ट्रपति वही बनता है, जो वोटरों के वोटों के कुल वेटेज का आधे से अधिक हिस्सा हासिल करे|

पहली पसंद का महत्व :

सबसे पहले का मतलब समझने के लिए वोट काउंटिंग में प्राथमिकता पर गौर करना होगा। सांसद वोट देते वक्त अपने मतपत्र पर ही क्रमानुसार अपनी पसंद के उम्मीदवार बता देते हैं|

सबसे पहले सभी मतपत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं। यदि इस पहली गिनती में ही कोई उम्मीदवार जीत के लिए जरूरी वेटेज का कोटा हासिल कर ले तो उसकी जीत हो गई लेकिन अगर ऐसा न हो सका तो फिर प्राथमिकता के आधार पर वोट गिने जाते हैं.

पहले उस उम्मीदवार को बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिलते हैं, लेकिन उसे प्राप्त वोटों से यह देखा जाता है कि उसकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं|

कैसे होते हैं उम्मीदवार बाहर :

दूसरी वरीयता के वोट ट्रांसफर होने के बाद सबसे कम वोट वाले उम्मीदवार को बाहर करने की नौबत आने पर अगर दो उम्मीदवारों को सबसे कम वोट मिले हों, तो बाहर उसे किया जाता है, जिसके पहली प्राथमिकता वाले वोट कम हों.

कौन बना रहता है दौड़ में :

अगर अंत तक किसी को तय कोटा न मिले तो भी इस सिलसिले में उम्मीदवार बारी-बारी से बाहर होते रहते हैं और आखिर में जिसे भी सबसे अधिक वोट मिलते हैं वही विजयी होगा|

दोस्तों यह होती है पूरी प्रकिया एक उपराष्ट्रपति बनने के लिए, आशा है इस लेख में आपको सम्पूर्ण जानकारी मिली होगी.

अगर किसी भी पॉइंट को लेकर आपके मन में किसी भी तरह की कोई समस्या आती है तो आप बेझिझक मुझे मेल या कमेंट के माध्यम से पूछ सकते हैं| यह लेख यही पर समाप्त हो रहा है, इस लेख को अंत तक पढने के लिए आपका धन्यवाद.

जरुर पढ़े ⇓

सामान्य ज्ञान ⇓

भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय (सम्पूर्ण जीवनी)

बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय

आज हम भारत के महान विद्वानों और महान स्वतंत्रता संग्राम में से एक – बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय पढेंगे| तो चलिए शुरू करते हैं-

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय

नाम :बाल गंगाधर तिलक
जन्म :23 जुलाई 1856
जन्मस्थान :रत्नागिरी, महाराष्ट्र
मृत्यु :1 अगस्त 1920

बाल गंगाधर तिलक को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक माना जाता है| वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, वह एक समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ भारतीय इतिहास, संस्कृत, हिन्दू धर्म, गणित और खगोल विज्ञानं जैसे विषयों के विद्वान भी थे.

बाल गंगाधर तिलक ‘लोकमान्य’ के नाम से भी जाने जाते थे| हलांकि बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु भारत को स्वतंत्रता मिलने से पहले ही हो गई परन्तु स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके नारे ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ ने लाखों भारतियों को प्रेरित किया.

आज भी कई परीक्षाओ में इस वाक्य को बोल कर इस पर लेख लिखने को या फिर इसको बोलने वाले का नाम एक नंबर में प्रशन पूछा जाता है.

बाल गंगाधर तिलक पर निबंध – Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi

बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी के एक चित्पवन ब्राह्मण कुल में हुआ था|

उनके पिता गंगाधर रामचन्द्र तिलक संस्कृत के विद्वान और एक प्रख्यात शिक्षक थे|

तिलक एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी में से एक थे और इनका गणित विषय से खास लगाव था.

बाल गंगाधर तिलक बचपन से ही अन्याय के घोर विरोधी थे और अपनी बात बिना हिचक के साफ़-साफ कहने वाले व्यक्तियों में से एक थे.

उनके परिवार में आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने वाले पहली पीढ़ी के भारतीय युवाओं में से एक बाल गंगाधर तिलक थे.

जब बालक तिलक महज 10 साल के थे तब उनके पिता का स्थानांतरण रत्नागिरी से पुणे हो गया| इस तबादले से उनके जीवन में भी बहुत परिवर्तन आया| फिर उनका दाखिला पुणे के एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल में हुआ और उन्हें उस समय के कुछ जाने-माने शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त हुई.

पुणे आने के तुरंत बाद उनकी माँ का देहांत हो गया और जब तिलक 16 साल के थे तब उनके पिता भी चल बसे|

तिलक जब मैट्रिकुलेशन में पढ़ रहे थे उसी समय उनका विवाह एक 10 वर्षीय कन्या सत्यभामा से करा दिया गया| मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने डेक्कन कॉलेज में दाखिला लिया.

सन् 1877 में बाल गंगाधर तिलक ने बी. ए. की परीक्षा गणित विषय में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण किया, आगे जा कर उन्होंने अपनी पढाई जारी रखते हुए एल. एल. बी. की डिग्री भी प्राप्त किया.

बाल गंगाधर तिलक के बारे में कुछ जानकारी – बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय

स्नातक होने के पश्चात तिलक ने पुणे के एक प्राइवेट स्कूल में गणित पढ़ाया और कुछ समय बाद पत्रकार बन गये| वह पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था (Western Education System) के पुरजोर विरोधी थे|

उनके अनुसार इससे न केवल विद्यार्थियों बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति और धरोहर का अनादर होता है| उनका ये मानना था की अच्छी शिक्षा व्यवस्था ही अच्छे नागरिकों को जन्म दे सकती है और प्रत्येक भारतीय को अपनी संस्कृति और आदर्शों के बारे में एक दुसरे को भी जागरूक कराना चाहिए.

अपने सहयोगी आगरकर और महान समाज सुधारक विष्णु शाश्त्री चिपुलंकर के साथ मिलकर उन्होंने ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की जिसका उद्देश्य देश के युवाओं को उच्च स्तर शिक्षा प्रदान करना था.

‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना के पश्चात, तिलक ने 2 साप्ताहिक पत्रिकाओं, ‘केसरी’ और ‘मराठा’ का प्रकाशन शुरू किया|

‘केसरी’ मराठी भाषा में प्रकाशित होती थी जबकि ‘मराठा’ अंग्रेजी भाषा की साप्ताहिकी थी.

जल्द ही दोनों बहुत लोकप्रिय हो गये, और इसके माध्यम से तिलक ने भारतियों के संघर्ष और परेशानियों पर भी प्रकाश डाला|

उन्होंने हर एक भारतीय से अपने हक़ के लिए लड़ने का आह्वान किया| तिलक अपने लेखों में तीव्र और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करते थे जिससे पाठक जोश और देश भक्ति के भावना से ओत-प्रोत हो जाये.

Information About Bal Gangadhar Tilak in Hindi

बाल गंगाधर तिलक सन् 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। अपने जीवन काल में वह पुणे म्युनिसिपल परिषद और बॉम्बे लेजिस्लेचर के सदस्य और बॉम्बे यूनिवर्सिटी के निर्वाचित ‘फैलो’ भी रहे.

एक आंदोलनकारी और शिक्षक के साथ-साथ तिलक एक महान समाज सुधारक भी थे| उन्होंने बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया और इसे प्रतिबंधित करने की मांग की| वे विधवा पुनर्विवाह के प्रबल समर्थक भी थे.

तिलक एक कुशल संयोजक भी थे| गणेश उत्सव और शिवाजी के जन्म उत्सव जैसे सामाजिक उत्सवों को प्रतिष्ठित कर उन्होंने लोगों को एक साथ जोड़ने का कार्य भी शूरू किया था|

सन् 1897 में अंग्रेज़ सरकार ने तिलक पर भड़काऊ लेखों के माध्यम से जनता को उकसाने, कानून को तोड़ने और शांति व्यवस्था भंग करने का आरोप लगाया|

उन्हें डेढ़ साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी| डेढ़ साल की सजा काटने के बाद तिलक सन् 1898 में रिहा हुए और स्वदेशी आंदोलन को शुरू किया, समाचार पत्रों और भाषणों के माध्यम से उन्होंने महाराष्ट्र के गाँव-गाँव तक स्वदेशी आंदोलन का सन्देश पहुँचाया.

उनके घर के सामने ही एक ‘स्वदेशी मार्केट’ का आयोजन भी किया गया|

Bal Gangadhar Tilak History in Hindi Language – बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु कब और कैसे हुई ?

इसी बीच कांग्रेस दो गुटों में विभाजित हो गया – उदारवादी और अतिवादी।

तिलक के नेतृत्व वाला अतिवादी गुट गोपाल कृष्ण गोखले के उदारवादी गुट का पुरजोर विरोधी था| अतिवादी स्वराज के पक्ष में थे जबकि उदारवादियों का ये मानना था की स्वराज के लिए अनुकूल वक्त अभी नहीं आया था|

इसी वैचारिक मतभेद ने अंततः कांग्रेस को दो हिस्सों में तोड़ दिया|

सन् 1906 में अंग्रेज़ सरकार ने तिलक को विद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया। सुनवाई के पश्चात उन्हें 6 साल की सजा सुनाई गयी और उन्हें मांडले (बर्मा) जेल ले जाया गया.

जेल में उन्होंने अपना अधिकतर समय पाठन-लेखन में बिताया| उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुष्तक ‘गीता रहष्य’ इसी दौरान लिखी| सजा काटने के पश्चात तिलक 8 जून 1914 को जेल से रिहा हुए| तत्पश्चात, वह कांग्रेस के दोनों गुटों को एक साथ लाने की कोशिश में जुट गए| लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली.

सन् 1916 में तिलक ने ‘होम रूल लीग’ की स्थापना की जिसका उद्देश्य स्वराज था| उन्होंने गाँव-गाँव और मुहल्लों में जाकर लोगों को ‘होम रूल लीग’ के उद्देश्य को समझाया.

भारत का यह महान सपूत 1 अगस्त 1920 को परलोक सिधार गया| लेकिन आज भी कई देशवाशियो के दिल में उनके लिए प्रेम और इज्ज़त है और हमेशा रहेगी.

बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय का यह लेख यही पर समाप्त हो रहा है, आशा है आपको यह लेख पसंद आया होगा और आप इस लेख को सोशल मीडिया के माध्यम से अपने दोस्तों के साथ शेयर भी ज़रूर करेंगे.

इस लेख को अंत तक पढने के लिए आपका धन्यवाद… जय हिन्द..!

अन्य जीवनी ⇓

राजा पोरस की कहानी (सिकंदर का आक्रमण) व उनकी मृत्यु

राजा पोरस की कहानी

राजा पोरस की कहानी, जीवन परिचय और उनके जीवन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण घटना|

राजा पुरूवास या पोरस का राज्य पंजाब के झेलम से लेकर चेनाब नदी तक फेला हुआ था| वर्तमान में यह लाहोर के पास स्तिथ है|

राजा पोरस का साम्राज्य बहुत विशाल था ये बहुत बड़े जमीनी भू-भाग के मालिक थे| जिस जगह के पोर्स राजा थे माना जाता है की इस जगह के लोगो ने पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु का बदला लेने के लिए मोहम्मद गोरी को मार दिया था.

पोरस अपनी बहादुरी के लिए बहुत विख्यात था जब सिकन्दर भारत आया तो पोरस के साथ उसका युद्ध हुआ| पोरस को खुखरायण लोगो का पूरा समर्थन मिला|

इस युद्ध के दोरान सिंध नदी और झेलम नदी को पार किये बिना पोरस के राज्य में पैर रखना बहुत ही मुश्किल कार्य था.

पोरस अपने राज्य की जमीनी भू-भाग से अच्छी तरह वाकिफ था| पोरस ने इस बात का पता लगाने की कोशिश की कि एवं सेना की शक्ति क्या है| एवं सेना के लोग घोड़ो पर सवार रहते थे और वो बहुत फुर्तिले तीर अन्दाज थे.

राजा पोरस को अपनी शक्ति पर पूर्ण विश्वास था लेकिन उन्होंने राजा सिकन्दर को नदी पार करने से रोका यही उनकी भूल साबित हुई.

जब सिकन्दर ने झेलम नदी पार की तब वह वहां फस गये क्यूंकि झेलम नदी में भाड़ आ गयी थी| जब सिकन्दर ने आक्रमण किया तो राजा आम्भी ने उसकी पूर्ण रूप से गुप्त रह कर सहायता की| आम्भी तक्षशिला के राजा थे आम्भी राजा पोरस को अपना दुश्मन मानता था.

भारत में सिकंदर का आक्रमण – राजा पोरस की कहानी

राजा सिकंदर ने युद्ध की शुरुआत से पहले राजा पोरस के पास एक पत्र पहुंचवाया जिसमे लिखा था की राजा पोरस सिकंदर के समक्ष समर्पण कर दे लेकिन राजा पोरस ने यह बिलकुल स्वीकार नहीं किया था| इसके बाद सिकंदर और पोरस का युद्ध शुरू हो गया.

पोरस की भारतीय सेना में घोड़ो की सेना भी थी जिसे देखकर महान सिकंदर और उनकी सेना चकित रह गये थे|

कहते है सिंकदर और पोरस जब अपने अपने घोड़ो पर सावर लड़ थे तब सिकन्दर निचे गिर गया था और राजा पोरस की तलवार सिकन्दर की गर्दन पर थी लेकिन तभी सिकन्दर के सैनिक उसे वहा से भगा ले गये थे.

पोरस एक बहुत शक्तिशाली राजा था| सिकन्दर का भारत पर विदेशी आक्रमण का इतिहास में बहुत प्रचलित है लेकिन कुछ इतिहास पुरु का मत है की पोरस सिकन्दर से हार गया था|

कुछ इतिहासकारों का मत है की सिकंदर पोरस के आगे हार मान चूका था परन्तु सत्य यही माना जाता है की सिकन्दर ने पोरस को गिरफ्तार कर लिया था.

लड़ाके कबीलों में से एक मालियों के गांव में सिकंदर की सेना एकत्रित हुई| इस हमले में सिकन्‍दर कई बार जख्‍मी हुआ|

जब एक तीर उसके सीने के कवच को पार करते हुए उसकी पसलियों में जा घुसा, तब वह बहुत गंभीर रूप से जख्‍मी हुआ| मेसेडोनियन अधिकारियों ने उसे बड़ी मुश्किल से बचाकर गांव से निकाला.

पोरस की सेना का वर्णन – King Porus History in Hindi

पोरस एक भारतीय शाशक था उसकी सेना भी बहुत विशाल थी पोरस एक समझदार और नेक शासक था वह अपनी सेना को पूर्ण रूप से हर खतरे से लड़ने के लिए सदैव तैयार रखता था|

पोरस की सेना में तीन हजार से भी अधिक सैनिक थे और चार हजार से अधिक घुड़सवार सैनिक थे| जो सैनिक घोड़ो पर सावर होकर ही युद्ध करते थे करीब तीन सो से अधिक रथि योद्धा थे इन सब के अलावा पोरस की सेना में एक सौ तीस हाथी की फोज भी थी जो युद्ध के दौरान सामने आने वाली किसी भी वस्तु को अपने पेरो से खुचल देते थे.

इन सब के अलावा पोरस ने दो हजार सैनिक और कई रथ अपने पुत्र के साथ उसके शिविर पर तैनात कर रखे थे यदि दुश्मन वहा हमला करता है तो वो भी भली पूर्वक सामना कर सके.

पोरस अपनी सेना को मजबूत रखने के लिए उनके खान पान का पूरा ध्यान रखता था और अपनी सेना को समय समय परशिकशन के लिए युद्ध कराया करता था की यदि कभी भी कोई आक्रमण करे तो तुरंत बेझिझक सामना किया जा सके.

बहादुर पोरस की कहानी – Story Of King Porus in Hindi

सिकंदर राजा पोरस से युद्ध करने से पूर्व भली भाति जानता था की वह किस्से युद्ध करने जा रहा है| राजा पोरस एक शक्तिशाली बहादुर राजा था| पराक्रमी पोरस को हराना इतना आसान नही था|

पोरस ने झेलम नदी के किनारे पहले से ही अपनी सेना टेंन्ट करदी थी की अगर दुश्मन आएगा तो उसका सामना वही से ही किया जा सके| इस बिच सिकन्दर चुप रहा उसने कोई गतिविधि नही की|

कुछ दिन बाद पोरस की सेना हल्की ढीली हुई और इसका फायदा उठाकर सिकन्दर की सेना पोरस के राज्य में ऊपर पहाड़ियों पर चढ़ गयी|

सिकन्दर नदी पार करने के बाद 17 मिल दूर आगे पोरस के राज्य में जा पहुंचा था और पोरस की सेना को पता ही नही था की सिकन्दर नदी पार कर आ पहुच गया है उन्हें लग रहा था की सिकन्दर की सेना अब तक नदी पार करने का रास्ता ढूंढ रही है और अचानक से सिकन्दर ने पोरस के राज्य पर आक्रमण कर दिया|

पोरस की सेना इससे अचंबित जरुर हुई लेकिन उन्होंने जमकर इसका सामना किया| बारिश के कारण पोरस की सेना के रथ जमीन पर सही से नही चल पा रहे थे लेकिन पोरस की सेना ने सिकन्दर की सेना को बहुत तोड़ जवाब दिया| पोरस की सेना निडर होकर राजा सिकन्दर की सेना से लड़ती रही.

पोरस की मृत्यु कैसे हुई ? – Porus Death History in Hindi

कई इतिहासकारों का कहना है की पोरस की मृत्यु एक विष कन्या द्वारा हुई थी परन्तु सत्य यह माना जाता है की पोरस की हत्या की हुई थी और आचार्य चाणक्य ने पोरस की हत्या करवाई थी ताकि चंद्रगुप्त मौर्य के विजयी अभियान में पोरस कोई रुकावट ना बन सके इसीलिए चाणक्य ने पोरस की मृत्यु करवाई थी.

दोस्तो आज हमने आपको राजा पोरस की कहानी के बारे में बताया है| राजा पोरस का इतिहास में इतना ही लिखा है| पोरस के विषय में इतिहास में बहुत कम मिला है|

आज इस लेख में हमने जो जानकारी लिखी है इसे बहुत पढ़ने के बाद लिखी है| अगर आपको यह जानकारी पसंद आई हो तो कमेंट जरुर करे और जैसे की इतिहास में बहुत से विषय पर तर्क है की ऐसा है ऐसा नही है इसिलए कुछ भी कहना आसान नही है क्यूंकि कहि कुछ लिखा है कहि कुछ बस आपको जानकारी अच्छी लगी हो तो शेयर भी जरुर करे.

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